(नेगी दा के जन्मदिन पर उनकी गीत यात्रा पर एक नज़र)
नरेन्द्र सिंह नेगी उत्तराखंड के प्रतिनिधि गायक हैं. उत्तराखंड और खास तौर पर गढ़वाल की प्रकृति, सौन्दर्य, प्रेम, बिछोह, वेदना,संस्कृति, रीति-रिवाज़,परम्पराएँ और यहाँ तक कि राजनीति व आंदोलन भी,जो कुछ यहाँ है,वह नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों में पाया जा सकता है. कई बार तो ऐसा भी लगता कि क्या उत्तराखंड में कोई ऐसा विषय है जो नेगी जी के गीतों में न आया हो ! यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकती है,लेकिन उनके गीतों के विषयों की व्यापकता को देखते हुए,ऐसा ही भान होता है.
और हाँ, वे सिर्फ गायक नहीं हैं,गीतकार हैं,कवि हैं,संगीतकार हैं.गायकी और संगीत से भी अधिक,यदि उनके गीतों का कोई सर्वाधिक मजबूत पहलू है तो वो गीत के बोल यानि लिरिक्स हैं. उनके जो सर्वकालिक लोकप्रिय गीत हैं, कवित्व ही उनकी चिर लोकप्रियता का कारण है. वे मूलतः कवि हैं,जो कैसेट,सी.डी. वाले व्यावसायिक माध्यम के जरिये गायक के रूप में लोगों तक पहुंचे. इस तरह देखें तो यदि वे सिर्फ कवि होते तो भी उनकी कविताओं की पहुँच और व्यापकता इतनी नहीं होती और सिर्फ गायक ही होते तो भी इस मुकाम पर नहीं होते. बल्कि कवित्व और गायकी का सम्मिश्रण है,जो नरेन्द्र सिंह नेगी को नरेन्द्र सिंह नेगी बनाता है. यह भी उनका हुनर ही कहा जाएगा कि वे कैसेट और फिर सी.डी. जैसे व्यावसायिक माध्यम के जरिये लोगों तक पहुंचे,लेकिन इस माध्यम के व्यावसायिक दबाव को उन्होंने अपनी गायकी और गीत रचना पर हावी नहीं होने दिया. वे अपने गीतों की स्तरियता का एक मानदंड तय करते हैं और फिर कुछ नगण्य अपवादों को छोड़ दें तो उस मानदंड को न केवल कायम रखते हैं,बल्कि उसे पुष्ट भी करते हैं.
नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों में भावों के साथ दृश्यात्मकता है. भाव ही नहीं चित्र भी है. बारिश आई तो उसके साथ क्या हुआ-
“हौळ छोड़ी भागी कका
काकी लुकीं रै उड्यार”
(हल छोड़ कर भागा काका
काकी छुप गयी खोह में)
या पति के आने की बाट जोहती भाभी जी हैं,उनकी उत्सुकता है,स्कूली लड़कियों की तरह श्रृंगार किया है और तभी बारिश उसके मन को बेचैन कर देती है.
यह दृश्यात्मकता उनके गीतों में यत्र-तत्र दिखाई देती है. पहाड़ी जीवन से वाकिफ व्यक्ति की आँखों के आगे गीत की स्वरलहरियों के साथ दृश्य में बनता चलता है.
नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों को,खास तौर पर हास्य गीतों को सुनने से लगता है कि गीतकार/कवि बेहद छुंयाळ है. छुंयाळ यानि की बातूनी. लेकिन वह गपोड़ी नहीं है,बतरसिया है. ऐसा बतरसिया जो संगीतमय बतरस करता है. उनका एक गीत है-“दादा अर ह्यूंद”. गीत क्या है,एक तरह से संगीतमय किस्सागोई है.जाड़े के दिनों में बरसात के समय का किस्सा है कि एक परिवार के विभिन्न सदस्य आग के सामने बैठ कर अपने में डूब हुए कुछ न कुछ कर रहे हैं. वे क्या-क्या कर रहे हैं,इसका भी ब्यौरा है. आदमी कितने हैं,इस कमरे में तो नेगी जी बताते हैं-द्वी बिसी मनखी छा तख- द्वी बिसि यानि चालीस आदमी थे वहाँ. और फिर अचानक दादी इंगित करती है कि दादा तो नहीं दिख रहे हैं कहीं. फिर क्या था,ये जो द्वी बिसी मनखी हैं,निकल पड़ते हैं,दादा को खोजने ! और पूछताछ में क्या होता है- जतगा मुख,उथगा बात- यानि जितने मुंह उतनी बात ! खोजने में सबसे रोचक दृश्य वह है,जब लोग बक्या यानि कि ओझा या तांत्रिक के पास पहुँचते हैं. तांत्रिक क्या बताता है ? वह बताता है-
काला गौणा मुंड सफ़ेद,
चौपया हर्च्यूं च एक,
जावा दखिन दिसाम खोजा,
ल्यावा खीसम हाथ कोचा
– यानि काले घुटने,सिर सफ़ेद,चौपाया गुम है एक,जाओ दक्षिण दिशा में खोजो,लाओ जेब में हाथ डालो,दक्षिणा निकालो ! हास्य की इस कथा के बीच अंधविश्वास के इस धंधे पर भी गीतकार चोट करता है. और सारे दिन की खोजबीन के बाद जब सब हताश-निराश लौटते हैं तो पता चलता है कि दादा तो उसी कमरे में है,जहां द्वी बिसी मनखी हैं. इस तरह देखें तो परिस्थितिजन्य हास्य है और बतरस का गीत है ये. और यह बतरस उनके हास्य गीतों में खूब पायी जाती है.
नरेन्द्र सिंह नेगी यौवन के,उसके अल्हड़पन और मदमस्तपन के गीत गाते हैं. लेकिन साथ ही यह यौवन अस्थायी है,यह बीत जाने वाले है,हाथ से छूट जाएगा-यह भाव भी उनके गीतों में निरंतर पाया जाता है. “चार दिन की ज्वानी ज़िंदगी,हैंसी खेली रैणू”, “पौणु सि आई यू ज्वानी दगड़्या”, “चला कौथिग देखि औला,इनी ज्वानी सदनि नि रांद”, “पाणी जनि बगदी ज्वनी,फिर नी औणी हाथ”,जवानी के बीत जाने,उसके क्षणिक होने की तरफ नेगी जी के गीत निरंतर इशारा करते हैं.जवानी के बीतने के विवरणों में भी “पौणु सि आई यू ज्वानी दगड़्या” बेहद रोचक है यानि जवानी,बाराती की तरह आई. बाराती,बारात के साथ आता है,नाचता-खेलता है और फिर चला जाता है. वैसी ही जवानी भी है,आती है,उछल कूद-धमाचौकड़ी मचा कर चल देती है !
गढ़वाली भाषा और उसकी शब्द संपदा को नरेन्द्र सिंह नेगी ने अपने गीतों के जरिये सहेजा और प्रसारित किया. ऐसे शब्द जो बोलचाल से बाहर हो चुके थे,उन्हें अपने गीतों के जरिये,नेगी जी लोगों के जेहन में लाये.भाषा के संदर्भ में हिन्दी में एक कहावत है कि “कोस-कोस पर बदले पानी,चार कोस पर वाणी”. इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए गढ़वाली का भी कोई एक स्वरूप नहीं है,बल्कि हर जिले, हर घाटी,हर पट्टी में उसमें भिन्नता है. नरेन्द्र सिंह नेगी की गीत रचना की यह विशेषता है कि एक तो उन्होंने एक मानक भाषा को अपनाने की कोशिश की,जो सब जगह स्वीकार्य हो और समझी जा सके. साथ ही विभिन्न इलाकों में बोली जाने वाली गढ़वाली के शब्दों को उन्होंने अपने गीतों में प्रयोग किया.
एक प्रश्न यह भी है कि सन 1974 में पहले गीत की रचना से आज तक चल रही इस गीत यात्रा का उद्देश्य क्या है ? एक गीत में नेगी जी इस सवाल का जवाब देते प्रतीत होते हैं : “भला-भला गीत लगौंला” यानि अच्छे-अच्छे गीत गाएँगे. तो अच्छे-अच्छे गीत का क्या आशय है ? सिर्फ अच्छी बात करेंगे,अच्छे हालात की,अच्छे हालात वालों की,अच्छे समयों की बात करेंगे ? देखिये तो अच्छे गीत कौन से होंगे :
धरति की सुख संपदा का गीत
मनखि की दुख विपदा का गीत
सौंगी उंदार्यूं का,औखि चढ़ै का
गीत जीवन की लंबी लड़ै
थक्यां हर्यां निरास्यां दगड़्यौं हुर्स्यौंला
भला-भला गीत लगौंला.......
अच्छे गीत धरती की सुख संपदा के गीत तो होंगे ही, पर वे मनुष्य की दुख- विपदा के गीत भी होंगे,आसान उतराइयों की गीत होंगे पर साथ ही कठिन चढ़ाइयों की गीत भी होंगे. ये जीवन की लंबी लड़ाई के गीत होंगे और ये गीत थके-हारे-निराश साथियों को उत्साहित करेंगे.
ये उन्नति के गीत होंगे,हर्षोल्लास के, हँसती हरियाली और बसंत के खिलते फूलों के गीत और साथ ही टूटती आस को धैर्य बंधाएंगे ये गीत. ये गीत हुनरमंद पुरुषों के और मेहनतकश महिलाओं के गीत होंगे,प्रेम के गीत,प्रेम में डूबे हृदयों के गीत, माँ-बाप की आँखों में बेटे-बेटी के दुख-सुख के गीत. हल,बैल खेत खलिहान के गीत.
एक तरह से देखें तो यह गीतकार का घोषणापत्र है,मैनिफेस्टो है,जिसमें वह घोषित करता है,क्या गाएगा,किसके गीत गाएगा. यह ऐलान है कि दुख-सुख में,विपत्ति और समृद्धि में,बरसात के उफनते गाड-गदेरों,हाड़ कंपाती ठंड से लेकर खिले-खिले बसंत तक में गीतकार अपने लोक के साथ खड़ा रहेगा,गायक उनके गीत गाएगा.
लगभग पांच दशक की नरेन्द्र सिंह नेगी की गीत यात्रा का यही सार है.
-इन्द्रेश मैखुरी


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