1 सितंबर 1994 को उत्तराखंड के इतिहास में वो तारीख है, जिससे अलग राज्य की मांग के लिए चल रहे आंदोलन में दमन कांडों का नया सिलसिला शुरू हुआ. इस तारीख से पहले रज्य आंदोलन में दमन का स्तर गोली चलाने तक नहीं पहुंचा था. लेकिन 1 सितंबर 1994 वो तारीख है, जब पहली बार शांतिपूर्ण आंदोलन पर तत्कालीन उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह की सरकार की पुलिस ने गोलियां चलाई. 1 सितंबर 1994 को खटीमा में उत्तराखंड आंदोलनकारियों पर पुलिस द्वारा गोलियां चलाई गयी. खटीमा से गोलीबारी और राज्य संरक्षित पुलिसिया जुल्म का जो सिलिसिला शुरू हुआ, वह फिर 2 सितंबर 1994 को मसूरी, 2 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर और 10 नवंबर 1995 को श्रीनगर(गढ़वाल) के श्रीयंत्र टापू तक जारी रहा है.
उत्तराखंड राज्य बना, यह 1994 के आंदोलन और उससे पहले 1952 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रहे कॉमरेड पी.सी. जोशी ने अलग उत्तराखंड राज्य की मांग करके जो सिलसिला शुरू किया था, जो उसका बाद अनवरत चलता रहा, उसका परिणाम है. उत्तराखंड आज जैसा है, उसके होने के चलते जो कई बार हताशा- निराशा की स्थितियां पैदा होती हैं, वह उस राज्य के आंदोलन में व्याप्त गैर राजनीति वाद, ख़ास तरह की अराजकता और सवर्ण बाहुल्य होने के चलते व्याप्त पूर्वाग्रहों का परिणाम है.
आज उत्ताराखंड जिनके हाथ है, वे उत्तराखंड को नफरतखंड बनाने पर तुले हुए हैं. सांप्रदायिक नफरत और जातीय भेदभाव की घटनाएं किसी भी सोचने-समझने वाले मनुष्य को शर्मिंदा करने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए. लेकिन यहां तो ये गर्व और राजनीतिक वर्चस्व का जरुरी हथियार बन गयी हैं.
जिस खटीमा कांड की 1 सितंबर को बरसी है, उसमें शहीद हुए आंदोलनकारियों की सूची देखिये.
शहीद होने वालों में पहला नाम है –सलीम अहमद का ! शहीद होने वालों की सूची में सिख परमजीत सिंह का नाम भी शामिल है. खटीमा में भगवान सिंह, प्रताप सिंह, धर्मानंद भट्ट, गोपी चंद्र, रामपाल सिंह ने भी उत्तराखंड राज्य के लिए शहादत दी.
जिस खटीमा में सलीम अहमद ने उत्तराखंड राज्य की मांग के लिए सीने पर पुलिस की गोली खायी, उसी खटीमा का रहने वाला व्यक्ति, राज्य का मुख्यमंत्री हो कर रोज जेहादों की नई किस्में इजाद करके, आये दिन सांप्रदायिक नफरत उलीचता रहता है. उन्हीं की सत्ता के संरक्षण में आये दिन काली-पीली बदरंग सेनाएं नफरत के कारोबार को आगे बढ़ाती रहती हैं. देश की सेना है, जो देश की रक्षा करती हैं और दूसरी ओर ये सत्ता संरक्षित सांप्रदायिक सेनाएं हैं, जो नफरत फैला-फैला पर कर देश और समाज को कमजोर करती रहती हैं. कुछ रक्षा नामधारी दल हैं, जिनसे उत्तराखंड के शांति और सौहार्द की ही रक्षा करने की नौबत आन पड़ी है.
उत्तराखंड बनने के 25 साल बाद यहां के जल-जंगल-जमीन समेत तमाम संसाधनों की लूट, वीरान होते गांव के साथ सांप्रदायिक व जातीय हिंसा भी एक बड़ा सवाल है. इस पर उत्तराखंड के तमाम संवेदनशील, न्यायपसंद, जनपक्षधर लोगों को जरुर गंभीरता से विचार करना चाहिए. किसी तरह का उन्माद और संकीर्णता कुछ लोगों को राजनीतिक रूप से लाभकारी लग सकती है, लेकिन अंततः इसकी कीमत उत्तराखंड को चुकानी पड़ेगी, यह निश्चित है.
1 सितंबर 1994 के खटीमा गोलीकांड के सभी शहीदों को नमन, श्रद्धांजलि !
-इन्द्रेश मैखुरी


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