cover

इस स्त्री द्वेषी पाखंड की क्षय हो !

 


यह कुछ 25-26 वर्ष पहले की बात है. एक नाटक के मंचन के सिलसिले में एक नाट्य दल के साथ दिल्ली जाना हुआ.


वहां एक धर्माचार्य के आश्रम में ठहराए गए. आश्रम तो क्या था, अंग्रेजों के जमाने की एक मंजिला कोठी थी जिसमें बड़ा सा लॉन भी था और सर्वेंट्स क्वार्टर भी थे. 


पहली शाम नाट्य दल को उन धर्माचार्य से मिलवाने को ले जाया गया, जिनका यह आश्रम था. मिलना क्या था, उनके सामने दंडवत होना था. स्थिति को समझते हुए हम कुछ मित्रों ने उक्त धर्माचार्य के दर्शन से खुद को अलग रखा. मिलवाने के कार्य कर रहे महानुभाव पर हमारे एक आस्तिक मित्र ने डायलॉग चिपकाया- गुरु जी मूर्ति पूजा में तो हमारा विश्वास है पर व्यक्ति पूजा में कतई नहीं है. उस जमाने में मुझे यह डायलॉग बड़ा युगांतकारी प्रतीत हुआ था.


नाट्य मंचन के बाद अपने शहर वापस लौटने से पहले फिर धर्माचार्य से मिलवाने यानि जाते समय दंडवत होने का कार्यक्रम हुआ. पता चला कि इस बार तो धर्माचार्य "आशीर्वाद स्वरूप" चांदी का सिक्का भी दे रहे हैं. मैं फिर भी नहीं गया क्योंकि मेरे दिमाग में सवाल था कि दंडवत होने की एवज में मिलने वाले चांदी के सिक्के का मैं क्या करूंगा, वो मेरे किस काम का ? 


बहरहाल चांदी का सिक्का प्राप्त करके लोग बाहर आये और वापसी की यात्रा पर चल पड़े. नाट्य दल में शामिल कुछ लड़कियां मेरे पास आई और उन्होंने मुझ से कहा- भैया आपने ठीक किया कि आप अंदर नहीं आये. मैंने उनसे पूछा कि वे ऐसा क्यों कह रही हैं तो उन्होंने कहा कि लड़कों को तो चांदी का सिक्का हाथ में दिया, लेकिन लड़कियों को सिक्का दूर से उछाल कर दिया गया, कहा गया कि धर्माचार्य स्त्रियों या लड़कियों को नहीं छूते ! 


मैंने उनसे कहा कि तुमने ऐसा सिक्का लिया ही क्यों ? वापस सिक्का धर्माचार्य के मुंह पर उछालते और कहते कि यदि स्त्री के स्पर्श से आपके अपवित्र होने की आशंका है तो आपके पवित्र होने की कोई गुंजाइश ही नहीं है क्योंकि जन्म तो आपने स्त्री के गर्भ से ही लिया है.






यह किस्सा इसलिए याद आया क्योंकि कुछ ऐसे ही धर्माचार्यों का दल अभी फ्रांस के एफ़िल टॉवर गया और उन्होंने वहां महिला स्टाफ को हटाने की मांग कर डाली ! उसके बाद एफ़िल टॉवर के स्टाफ ने हड़ताल कर दी. निश्चित ही यह महिला विरोधी आचरण था. महिला स्टाफ को हटाने की मांग करने वाले इस धार्मिक दल से पूछा जाना चाहिए कि भाई तुम वहां करने क्या गए थे ? एफ़िल टॉवर कोई धर्मस्थल तो है नहीं, जिसके दर्शनों का पुण्य हासिल करना बहुत आवश्यक था ! 


और बंधुओ, तुम तो नॉन बायोलॉजिकल भी नहीं हो, स्त्री के गर्भ से ही उत्पन्न हुए हो, तो तुम्हें स्त्रियों के साये से भी इस कदर परेशानी या नफरत क्यों है ? 


धर्म के नाम पर फैलाए जा रहे इस स्त्री द्वेषी पाखंड की क्षय हो ! 


-इन्द्रेश मैखुरी



Post a Comment

0 Comments