भराड़ीसैंण में 09 से 13 मार्च 2026 तक हुए विधानसभा
के बजट सत्र में गैरसैंण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बनाने का सवाल एक बार फिर
पूरे उत्तराखंड में चर्चा में आ गया.
पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के उस बयान ने भी लोगों को आहत किया, जिसमें उन्होंने
भराड़ीसैंण स्थित विधानसभा भवन को सफ़ेद हाथी करार देते हुए, उसे वेडिंग और
कॉरपोरेट डेस्टिनेशन यानि शादियों और धन्नासेठों का गंतव्य बनाने की मंशा जाहिर
की.
इस मामले पर जब विधानसभा के अंदर और बाहर घेराबंदी
ज्यादा बढ़ने लगी तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा में गैरसैंण पर हो
रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने तो बजट में गैरसैंण को स्मार्ट
सिटी बनाने का प्रावधान किया है. ऐसा कहते
हुए मुख्यमंत्री ने विपक्ष के विधायकों को बजट ठीक से पढ़ने की नसीहत तक दे डाली !
अव्वल तो यह मुख्यमंत्री जी, उत्तराखंड के जनता
गैरसैंण को स्मार्ट सिटी बनाने की नहीं बल्कि उत्तराखंड के स्थायी राजधानी बनाने
की मांग नब्बे के दशक से करती रही है.
गैरसैंण में एक अदद एसडीएम के लिए तो लोगों को
लगातार आंदोलन करना पड़ता है तो वे स्मार्ट सिटी के इस झुनझुने का क्या करेंगे ?
स्मार्ट
सिटी कैसी बनाएंगे गैरसैंण को, जैसी स्मार्ट सिटी देहरादून में बनाई है आपके डबल
इंजन ने मुख्यमंत्री जी ?
देहरादून में स्मार्ट सिटी के नाम पर हो रही खुदाई
और उठापटक से तो आम जन वैसे ही त्रस्त चल रहे थे, लेकिन भराड़ीसैंण में आयोजित विधानसभा के सत्र में
प्रस्तुत की गयी भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने तो
स्पष्ट कर दिया कि देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने की परियोजना किस कदर मनमानी और
भ्रष्टाचार का शिकार रही है.
10 मार्च 2026 को विधानसभा में प्रस्तुत कैग की
रिपोर्ट बताती है कि करोड़ों रूपए बिना मतलब, बेसबब खर्च किये गए और कई सारी चीजों का कोई हिसाब- किताब ही नहीं था.
कैग की रिपोर्ट के अनुसार पूरी प्रक्रिया में इस
कदर मनमानी का बोलबाला था कि स्मार्ट सिटी परियोजना की योजना से जुड़े हुए दस्तावेज
तक ऑडिट के लिए नहीं प्रस्तुत किये गए. रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि
स्मार्ट सिटी की पहली योजना मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) द्वारा
तैयार की गयी थी. जून 2017 में केंद्रीय आवासन और शहरी
कार्य मंत्रालय द्वारा इस योजना की स्वीकृति के बाद इसे क्रियान्वित करने के लिए
देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड ( डीएससीएल) नामक कंपनी अस्तित्व में आई. इस कंपनी
ने एक संशोधित स्मार्ट सिटी योजना, केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय को भेजी. ऑडिट रिपोर्ट से पता चलता है
कि एमडीडीए द्वारा तैयार परियोजना के लिए ब्रिटेन की कंपनी- प्राइज वाटर हाउस
कूपर्स – से कंसल्टेंसी ली गयी थी. इसका आशय यह है कि सिर्फ प्रोजेक्ट बनाने में
ही लाखों रूपए खर्च किये गए और फिर दूसरी कंपनी अस्तित्व में आ गयी तो उसने
प्रोजेक्ट दोबारा बनाया !
हैरत यह है कि इतना होने के बाद भी ना तो एमडीडीए
की बनाई योजना के दस्तावेज ऑडिट के सामने पेश किये गए और ना ही डीएससीएल की बनाई
योजना के ! ऐसी भी क्या स्मार्ट सिटी की परियोजना बना रहे थे, पुष्कर सिंह धामी जी
कि जिसके दस्तावेज ऑडिट करने वालों से तक छुपाए गए ?
कैग की रिपोर्ट बताती है कि कई “स्मार्ट समाधान” तो
क्रियान्वयन के दौरान ही हटा लिए गए ! दो सरकारी संगठनों और एक विदेशी कंसल्टेंसी
फर्म ने कैसी परियोजना बनाई कि जिन्हें कागज़ पर “स्मार्ट सोल्यूशन” बताया गया, वे धरातल पर लागू
करने के योग्य ही नहीं पाए गए !
कैग की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2022 में विकसित
बॉयोमेट्रिक एवं सेंसर आधारित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन मॉड्यूल का प्रयोग फरवरी 2025 तक नहीं किया जा सका, जिसके चलते 4.55 करोड़ रूपए का खर्च व्यर्थ चला गया.
कैग के अनुसार पर्यावरण सेंसर पर खर्च किये गए 2.62
करोड़ रूपए और मल्टी यूटिलिटी डक्ट पर खर्च किये गए 3.24 करोड़ रूपए भी निरर्थक ही
खर्च किये गए. पर्यावरण सेंसरों की तो गुणवत्ता को भी ऑडिट में दोयम दर्जे का पाया
गया
ऑडिट रिपोर्ट ने पाया कि 5.19 करोड़ रूपए का भुगतान
ऐसा है, जिसमें अनियमितता है
और इसमें से बहुत सारा भुगतान बिना वैध दस्तावेजों के कर दिया गया है.
अगस्त 2018 में पर्यावरण विशेषज्ञ को मानदेय के रूप
में 1 लाख 50 हज़ार रूपए का भुगतान किया गया,लेकिन उपस्थिति के दस्तावेजों के अनुसार उक्त विशेषज्ञ इस महीने मौजूद ही नहीं
थे.
स्मार्ट सिटी परियोजना में किस तरह की मनमानी की जा
रही थी,इसको कैग की रिपोर्ट
में दिए गए एक उदाहरण से समझ सकते हैं. रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2018 में आईटी
एक्सपर्ट के लिए आवेदन आया तो योग्यता और अनुभव पूरा न होने का हवाला देते हुए
मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने नवंबर 2018
में इस आवेदन को खारिज कर दिया. लेकिन बाद
में इसी आवेदक को न केवल बैक डेट से आईटी
एक्सपर्ट नियुक्त किया गया बल्कि अक्टूबर 2018 से लेकर जुलाई 2019 तक,नौ महीने के
35.84 लाख रूपए मानदेय के तौर पर
भी दिए गए.
परियोजना में प्रस्तावित कुछ किया गया,क्रियान्वयन में कुछ और किया गया, ऐसे किस्सों से ये रिपोर्ट भरी पड़ी है. न तो समय पर काम पूरा न होने पर किसी की जवाबदेही तय
हुई,ना ही खराब काम करने पर. परेड ग्राउंड से लेकर पलटन
बाज़ार तक गड़बड़ियां ही गड़बड़ियां बताई गयी हैं, कैग की रिपोर्ट में !
जिस सरकार के राज में देहरादून में स्मार्ट सिटी के नाम पर इस तरह की कारगुजारियां हुई हों,वही सरकार अब गैरसैंण को स्मार्ट सिटी का झुनझुना थमा कर प्रदेश की जनता को बहलाना चाहती है ! देहरादून में तो हज़ार करोड़ रूपए का बजट था, उसमें से 737.50 करोड़ रुपए जारी हुए और 634.11 करोड़ रूपए खर्च किये गए.
गैरसैंण को जो स्मार्ट सिटी का झुनझुना थमाया जा रहा है,उसमें तो नगर निकायों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए कुल 30 करोड़ रूपए का बजट प्रवाधान है ! इसमें गैरसैंण के अलावा पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी को भी “स्मार्ट” बनाया जाना प्रस्तावित है.
देहरादून में तो दिलाराम बाज़ार चौक पर जो स्मारक
ध्वज परियोजना के नाम पर 30.5 मीटर ऊंचा राष्ट्रीय ध्वज स्थापित किया गया है,उसकी ही लागत
9.28 लाख रूपए बताई गयी है !
इसलिए देहरादून में स्मार्ट सिटी के नाम पर जैसी लूट
और बंदरबांट की परियोजना चली है,उसे अपने पास ही रखिये
मुख्यमंत्री जी ! गैरसैंण को उत्तराखंड की
स्थायी राजधानी बनाने के लिए लोग पहले भी लड़े हैं,आगे भी लड़ेंगे !
-इन्द्रेश मैखुरी

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