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वे मशाल भला कैसे उठाते !

 


उन्होंने महिला सम्मान के नाम पर मशाल उठाने का अहद किया था, लेकिन उससे तो उनका दूर का ही रिश्ता है !


जो जम्मू के कठुआ से लेकर उत्तराखंड के लालकुआं तक बलात्कार के आरोपियों के समर्थन में जुलूस निकाल दें, जो आसाराम और रामरहीम के बगलगीर हों, जो बिलकिस बानो के दुष्कर्मियों को जेल से “संस्कारी” का लेबल लगा कर छुड़वा लाएं, जो अंकिता भंडारी की हत्या के कारक वीआईपीओं को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हों, सोचिये तो वो महिला सम्मान के नाम पर हाथ में जलती हुए मशाल थामे, कैसे भौंडे लगते ! मशालों की रौशनी में महिला सम्मान और सुरक्षा के मामले में उनका विकृत चेहरा, भीषण रूप से उभरता.

इसलिए गत्ते की मशाल उठा कर, उन्होंने महिला सुरक्षा और सम्मान के मामले में, अपने स्याह ट्रैक रिकॉर्ड पर असली मशाल की रौशनी पड़ने से बचा लिया !





इससे मशाल और उसकी रौशनी की गरिमा भी बची रही !


पहले-पहल जब यह खबर आई कि वे मशाल जलाएंगे और मशाल उठा कर चलेंगे तो सुन कर थोड़ा अचरज हुआ ! ऐसा इसलिए कि जलाने में तो वे सिद्धहस्त हैं, लेकिन मशाल जलाने का उनका कोई अनुभव नहीं है. हां घर, दूकान, देश,समाज कहीं भी आग लगानी हो तो इसमें उनका कोई सानी नहीं है. उनकी इस विशेषता को देख कर ही तो बशीर बद्र साहब ने लिखा था कि :

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में “


वे घर के चिराग भी हो जाएं तो तुरंत वो कहावत हवाओं में तैरने लगती है कि घर को आग लगी, घर के चिराग से !


यूं जलती तो मशाल भी है, आग तो उसे रौशन करने के लिए भी जलानी पड़ती है. लेकिन मशाल को रौशनी करने के लिए जलाई गयी आग, चेतना जगाने वाली आग होती है. घर-समाज को फूंकने के लिए लगाईं जाने वाली आग, चेतना को कुंद करने वाली होती है.


मशाल जला कर समाज अग्रगामी दिशा में बढ़ता है और उनकी तो सारी राजनीति ही पश्चगामी है ! वे तो मानते हैं कि देश और समाज को भला करने का एकमात्र तरीका, समाज को अतीत में ले जाना है ! आज के दौर के सारे आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल वे समाज को अतीत में ले जाने में ही करना चाहते हैं !

मशाल उठा कर पीछे की ओर नहीं जाया जा सकता. इसलिए मशाल और उनकी रजनीति में मूलभूत अंतरविरोध है, विरोधाभास है ! इसलिए वे गत्ते की ही मशाल उठा सकते हैं !


-इन्द्रेश मैखुरी


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