देहरादून में बीती रात एक एनकाउंटर हुआ. एक लूट की वारदात हुई, जिसमें जिस व्यक्ति से लूट हुई, उस पर आरोपियों ने गोली चलाई. फिर पुलिस पर भी गोली चलाए जाने का आरोप है, जिसमें प्रेमनगर के कोतवाल नरेश राठौर जख्मी हो गए. आरोपी बदमाशों की गोली से घायल कोतवाल शीघ्र स्वस्थ हों, ऐसी कामना है.
तस्वीर- एआई
यह बड़ा विचित्र है कि इस पुलिस एनकाउंटर का जिक्र करते हुए अख़बारों और उनकी देखा-देखी पोर्टल्स ने 2009 में हुए रणवीर एनकाउंटर का जिक्र करना शुरू कर दिया. 2009 के रणवीर एनकाउंटर और इस एनकाउंटर में क्या समानता है भला ? सिर्फ इतनी कि दोनों ही मुठभेड़ में पुलिस ने सामने वाले को मार गिराया !
लेकिन रणवीर एनकाउंटर तो पूरी तरह फर्जी था, यह सिद्ध हो चुका है. पुलिस ने सिर्फ टशन या अहम में एक युवक की हत्या कर दी और फिर उसे एनकाउंटर सिद्ध करने की कोशिश की. पुलिस का यह झूठ ज्यादा दिन नहीं चला. इंस्पेक्टर, सब इन्स्पेक्टरों समेत एक दर्जन से ज्यादा पुलिस कर्मी उक्त एनकाउंटर में अपराधी सिद्ध हो चुके हैं और जेल की सजा काट रहे हैं.
तो एक लूट की वारदात के एनकाउंटर और एक फर्जी एनकाउंटर की तुलना का क्या मतलब है ? अमर उजाला ने तो इन दोनों एनकाउंटरों की तुलना करते हुए यहां तक लिख डाला – “जानकारों का मानना है कि 2009 के मामले से सबक लेते हुए इस बार पुलिस को हर पहलू को साफ़-साफ़ सामने रखना होगा....” अखबार की खबर से तो ऐसा लगता है, जैसे कि इस मामले के साफ़-साफ़ होने में कोई कमी है !
यूं पुलिस एनकाउंटर के संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के साफ़-साफ़ निर्देश हैं और उच्चतम न्यायालय ने भी 2014 में पी.यू.सी.एल. बनाम महाराष्ट्र राज्य आदि के मामले में बहुत स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किये हैं, जिन्हें हर एनकाउंटर के बाद पुलिस को अमल में लाना होता है.
उक्त दिशा निर्देशों के अनुसार :
अपराधियों की हलचल के संदर्भ में कोई सूचना आती है तो उसे लिखित में दर्ज किया जाएगा.
कोई एनकाउंटर होता है और उसके परिणाम स्वरुप कोई मृत्यु होती है तो उसकी तत्काल एफआईआर दर्ज की जाएगी और बिना देरी के अदालत को अग्रेषित की जाएगी.
घटना या एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच सीआईडी या अन्य थाने की पुलिस द्वारा की जाएगी और जांच की अगुवाई, एनकाउंटर में शामिल अफसर से कम से कम एक रैंक ऊपर वाले अफसर द्वारा की जाएगी.
एनकाउंटर की सूचना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या राज्य मानवाधिकार आयोग को भी भेजनी होगी.
एनकाउंटर की घटना की मजिस्ट्रेटी जांच का प्रावधान भी उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों में है.
चूंकि पुलिस एनकाउंटर के मामले में यह उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित प्रक्रिया है तो इसका अनुपालन तो देहरादून पुलिस भी करेगी, ऐसा माना जाना चाहिए.
लेकिन इस एनकाउंटर में मारे गए अकरम के बारे में गढ़वाल के पुलिस महानिरीक्षक राजीव स्वरुप और देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेन्द्र सिंह डोबाल द्वारा जो बातें प्रेस कांफ्रेंस में बताई गयी, उससे तो यह सवाल पैदा होता है कि पुलिस और ख़ास तौर पर इंटेलिजेंस तंत्र अपराधियों और ख़ास तौर पर आदतन अपराधियों की निगरानी कर भी रहा है या उसका काम सिर्फ सरकार विरोधियों की निगरानी करना भर ही है ?
एनकाउंटर में मारे गए अकरम के बारे में आईजी (गढ़वाल) और एसएसपी देहरादून की प्रेस वार्ता में बताया गया कि वो एक अन्य मामले की सुनवाई के लिए अदालत की तारीख पर आया था और उसके बाद उसने लूट की वारदात को अंजाम दिया. मारे गए अभियुक्त पर 16 मुकदमें दर्ज थे और वह एक सक्रिय अपराधी था. 2014 में देहरादून के बालावाला में डकैती के दौरान एक युवक की हत्या का आरोप भी उस पर था.
जिस पर 16 मुकदमें हों और उनमें से कई देहरादून में ही दर्ज हों और उसके बावजूद ऐसा अपराधी देहरादून आये, एक और वारदात को अंजाम दे तो क्या यह नहीं दर्शाता है कि अपराधियों पर निगरानी रखने का पुलिस का तंत्र और उन्हें निरुद्ध करने का इंतजाम भी कमजोर है ? क्या अपराधी के अपराध करने या एनकाउंटर में मारे जाने से इस बात पर पर्दा डाला जा सकता है कि ऐसे अपराधियों की ना तो ठीक से निगरानी पुलिस तंत्र द्वारा की जा रही है, ना ही उन्हें निरुद्ध करने में गंभीरता बरती जा रही है.
हर वारदात के बाद वारदात की कहानी सुनाना पुलिसिंग नहीं है, अपराध और अपराधियों पर प्रभावी नकेल कसना, सही मायनों में पुलिसिंग है. लेकिन जब राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करना ज्यादा जरुरी काम हो और राजनीतिक आकाओं को पुलिस के प्रभावी और अनुशासित होने या ना होने से कोई फर्क ना पड़ता हो तो फिर इस बात पर गौर कौन करेगा ?
-इन्द्रेश मैखुरी


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