कोटद्वार में बीती 26 जनवरी को एक मुस्लिम बुजुर्ग की दुकान का नाम बदलवाने आये तथाकथित धर्म रक्षकों के खिलाफ उक्त बुजुर्ग के पक्ष में एक जिम ट्रेनर दीपक कुमार और उनके दोस्त विजय रावत खड़े हुए.
उक्त बुजुर्ग के साथ एकजुटता दिखाने के लिए दीपक कुमार ने अपना नाम मोहम्मद दीपक बताया. धार्मिक नफरत के मारों ने दीपक को ट्रोल करने के लिए इस बात का वीडियो वायरल कर दिया. वे सोचते थे कि जैसे वे किसी भी दूसरे धर्म के नाम से नफरत करते हैं, वैसे ही आम लोग भी करेंगे, इसीलिए उन्होंने वीडियो का वो अंश ही वायरल किया, जिसमें दीपक अपना नाम मोहम्मद दीपक बता रहे हैं. लेकिन हुआ इसका उलट. पूरे देश में वायरल हुए वीडियो से दीपक कुमार सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल बन कर उभरे. स्कूल ड्रेस बेचने वाले बुजुर्ग पर हमला करने वालों की भी खूब छिछालेदर हुई. इससे बौखला कर उन्होंने 31 जनवरी को देहरादून, हरिद्वार, रुड़की आदि जगहों से कोटद्वार जा कर खूब उत्पात मचाया.
पुलिस ने इस उत्पात की एफआईआर तो लिखी पर उत्पात मचाने वालों को नामजद नहीं किया बल्कि अज्ञात के नाम मुक़दमा दर्ज किया. दीपक कुमार ने आरोपियों को नामजद करते हुए शिकायत दी तो वह दर्ज ही नहीं की गयी.
दीपक कुमार और विजय रावत के खिलाफ भी आरोपियों की ओर से एक एफआईआर दर्ज करवा दी गयी. यह एफआईआर इस कदर झूठी थी कि लिखवाने वालों ने लिखा था कि वे विश्व हिंदू परिषद के धर्म रक्षा निधि के बारे में जन संपर्क करने के लिए उक्त दुकान पर गए थे. इस बात को अन्य किसी जगह पर उन्होंने खुद भी नहीं कहा बल्कि सब जगह यही कहा कि वे तो दुकान का नाम बदलवाने गए थे.
बहरहाल दीपक कुमार और विजय रावत के खिलाफ दर्ज करवाई गयी उक्त एफआईआर रद्द किये जाने, इस प्रकरण में कोताही बरतने वाले पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई किये जाने और सुरक्षा मुहैया कराए जाने के लिए दीपक कुमार ने अधिवक्ता नवनीश नेगी के जरिये उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल में एक याचिका दाखिल की. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय, नैनीताल के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने जिस तरह की टिप्पणियां की, वे हैरत में डालने वाली हैं.
बेंच ने कहा कि आप मामले को सनसनीखेज बना रहे हैं, आप सोशल मीडिया पर प्रवचन दे रहे हैं, पुलिस को दबाव में लेना चाहते हैं आदि-आदि.
लेकिन दीपक कुमार के अधिवक्ता का जो कानूनी नुक्ता था कि दीपक कुमार और विजय रावत पर दंगा करने (Rioting) के लिए एफआईआर हुई है और दो लोगों में तो दंगा होता ही नहीं, इस तर्क को तवज्जो देने को पीठ तैयार नहीं हुई.
दीपक कुमार की ओर से अधिवक्ता नवनीश नेगी ने एकल पीठ को बताया कि उन्होंने प्रदेश के विभिन्न कोने से आ कर हुड़दंग करने, गाली-गलौच करने और सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने की कोशिश करने वालों के खिलाफ 31 जनवरी को नामज़द एफआईआर दी, लेकिन पुलिस ने अपनी तरफ से अज्ञात के खिलाफ ही एफआईआर लिखी. इस तथ्य को भी तवज्जो नहीं दी गयी. जितनी कठोरता से दीपक कुमार के अधिवक्ता से जिरह की जा रही थी, उसका अंश भर भी इस्तेमाल करते हुए इतना तो पूछा ही जा सकता था कि जब पुलिस खुद कह रही है कि उन्होंने हुड़दंग किया, गाली-गलौच की और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया तो दीपक कुमार द्वारा उनके नाम बताए जाने के बावजूद उनके नाम लिखने में क्या बाधा थी !
दीपक कुमार को जान से मारने की धमकियाँ दी गयी. यहां तक उनका सिर काट कर लाने वाले को 5 लाख रुपए इनाम देने की भी घोषणा की गयी. इस आधार पर उच्च न्यायालय में दाखिल याचिका में सुरक्षा की मांग की गयी. लेकिन 19 मार्च को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने कहा कि आप सुरक्षा की मांग कैसे कर सकते हैं, आप तो संदिग्ध आरोपी हैं ! सस्पेक्टेड अक्यूज्ड शब्द इतनी बार दोहराया गया, गोया यह अपराध सिद्ध होने से भी ज्यादा जघन्य अवस्था हो ! फर्ज कीजिये कि किसी पर कोई भी आरोप है, संगीन आरोप ही है तो क्या किसी को, उसका क़त्ल कर देने का कानूनन अधिकार हासिल हो जाएगा ? क्या उसका अपराध सिद्ध होने या उसके निर्दोष साबित होने से पहले ही उसके प्राण हरने की छूट किसी को भी दी जा सकती है ? यह कानून और न्यायशास्त्र की कौन सी और कैसी नजीर पेश की गयी ?
यह निर्देश तो ठीक है कि याचिकाकर्ताओं को जांच में सहयोग करना चाहिए. लेकिन एक भी शब्द ना तो हेट स्पीच के खिलाफ बोला जाता है, न धर्म के नाम पर किये जाने वाले अपराधों के विरुद्ध कोई टिपण्णी है और ना ही सरकार व पुलिस को कोई निर्देश पीठ की तरफ से है कि इस तरह की घटनाओं को सख्ती से, कानून के अनुसार निपटे ! इसे क्या समझा जाए, कैसे समझा जाए ?
दीपक कुमार के सोशल मीडिया पर लिखने-बोलने पर कठोर टिपण्णी है, लेकिन सोशल मीडिया के जरिये घृणा फैलाने पर पीठ की ओर से कोई टिपण्णी नहीं है. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने जब अदालत से पूछा कि हम ना दें(बयान) बाकी दें ? तब जा कर पीठ की ओर से कहा गया कि ये सभी के लिए है !
एक बार यह भी पूछ लिया जाता कि जिन्होंने हुड़दंग किया, गाली-गलौच की, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई, वे अज्ञात दो महीने में पुलिस को ज्ञात हो सके या नहीं और ज्ञात हुए तो तो उनके खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई ! याचिकाकर्ता से तो कहा गया कि उसे पुलिस को सहयोग करना चाहिए, पुलिस का मनोबल नहीं गिरना है, लेकिन पुलिस से भी कह दिया जाता है कि उत्पातियों को सजा दिलानी है ताकि समाज में अमन-चैन कायम रहे तो यह अमन पसंद नागरिकों का मनोबल भी कुछ ऊंचा करता !
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कोटद्वार में बुजुर्ग को धमकाने और उसके बाद हुए उत्पात पर एक शब्द नहीं बोला, लेकिन दीपक कुमार के खिलाफ वो लगातार टिपण्णी करते रहे, जिनका मंतव्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही रहा है. एक आम नागरिक के बारे में जब राज्य का मुख्यमंत्री टिपण्णी करता है तो वो अपने पद की गरिमा को गिराता है और स्वयं को ट्रोल की निम्नता तक ले आता है. पर मी लॉर्ड वो तो फिर भी राजनेता हैं, जिनकी राजनीति में यदि सांप्रदायिकता और ध्रुविकरण हटा दिया जाए तो कुछ बचेगा ही नहीं ! कानून की बड़ी कुर्सी पर बैठा हुआ स्वर तो कम से कम ऐसा नहीं होना चाहिए, उसमें न्याय, इंसाफ और कानून की निगाह में सबके लिए बराबरी की भावना झलकनी चाहिए !
पुलिस पर भरोसा रखने पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय की इस एकल पीठ ने काफी जोर दिया है, देखें उत्तराखंड पुलिस न्याय और कानून के भरोसे पर कितनी खरी उतरती है !
-इन्द्रेश मैखुरी


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