उत्तराखंड में भाजपा सरकार का कार्यकाल, ख़ास तौर पर पुष्कर सिंह धामी का मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यकाल, धार्मिक विभाजन और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न के दौर के रूप में स्थापित है. अमेरिकी के वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक- सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड हेट की हालिया रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक कर रही है. उक्त रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2025 में सर्वाधिक हेट स्पीच यानि नफरत भरे भाषण देने वाले व्यक्ति- उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हैं !
पुष्कर सिंह धामी अक्सर ही “लव जेहाद”, “लैंड जेहाद”, “थूक
जेहाद” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते रहते हैं, जो न संवैधानिक हैं और ना ही
गरिमापूर्ण. लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए इन शब्दों का बहुदा
इस्तेमाल किया जाता है.
अपने सांप्रदायिक एजेंडे को कानूनी जामा पहनाने के लिए 2018
में भाजपा सरकार एक कानून लेकर आई, जिसका नाम है- उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता
अधिनियम. यह विचित्र विरोधाभास है कि जो कानून घोषित तौर पर धर्मांतरण रोकने के
लिए लाया गया, उसका नाम धार्मिक स्वतंत्रता कानून रखा गया.
जिस समय यह कानून लाया जा रहा था, उस समय भी यह सवाल था कि
क्या धर्मांतरण, उत्तराखंड में इतना बड़ा संकट बन चुका है कि उसे रोकने के लिए
कानून बनाना पड़े ? यह स्पष्ट ही था कि समस्या से ज्यादा यह कांस्पिरेसी थ्योरी
यानि नकली भय के सिद्धांत के आधार पर खड़ा है, जिसके जरिये अल्पसंख्यकों के प्रति
भाजपा के द्वेष को ही साधने की कोशिश हो रही है.
30 जनवरी 2026 को अंग्रेजी अख़बार- इंडियन एक्सप्रेस- में छपी एक खोजपरक रिपोर्ट बता रही है कि किस तरह से धर्मांतरण रोकने के नाम पर बने कानून का उपयोग सिर्फ अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए हुआ और अदालत में न्याय के कसौटी पर यह कानून धराशाई हो रहा है.
इंडियन एक्सप्रेस की देहरादून संवाददाता ऐश्वर्या राज की
रिपोर्ट के अनुसार इस कानून के अस्तित्व में आने से लेकर अब तक 62 एफआईआर दर्ज हुई. इंडियन एक्सप्रेस द्वारा सूचना
के अधिकार के तहत दाखिल 30 आवेदनों के तहत 51 मामलों की स्थिति स्पष्ट हुई.
इन 51 मामलों में से 5 मामले ऐसे हैं, जहां मुकदमें की
कार्रवाई पूरी हो चुकी है और पांचों ही मामलों में जिन पर गैरकानूनी रूप से
धर्मांतरण का आरोप लगा,वे अदालत द्वारा बरी किये जा चुके हैं.
7 मामले ऐसे हैं, जो
अदालत द्वारा खारिज किये जा चुके हैं.
29 मामले में आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, जिसमें से 11
मामलों में उच्च न्यायलय से जमानत मिली और एक मामले में उच्चतम न्यायलय से. इसका
आशय साफ़ है कि अधिकतर मामलों में निचली अदालत से ही जमानत मिल गयी.
पांच मामलों में सुनवाई शुरू नहीं हुई है और दो मामलों में
आरोपी, कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए उच्च न्यायालय गए हैं. सिर्फ तीन ही मामले
ऐसे हैं,जहां आरोपियों को जमानत नहीं मिल सकी है.
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार 24 मामले जिनमें मुकदमा
अदालत में चल रहा है और धर्मांतरण कानून के साथ बलात्कार या अपहरण की धाराएं भी जोड़ी गयी, उनमें
से 16 की स्थिति ज्ञात है. इनमें से दस मामलों में अदालत ने पाया कि जोड़े आपसी सहमति
से रिश्ते में थे और एक मामले में वे दोस्त थे.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपने लेख के शुरूआती पैराग्राफ, जिसे
पत्रकरिता की भाषा में इंट्रो कहा जाता है, में लिखा है कि घोषित तौर पर “जबरन धर्मांतरण ” को रोकने के लिए बना यह कानून,
उस आधारभूत कानूनी परीक्षा को पूरा करने के में अक्षम है, जिसे सबूत कहा जाता है. इसका
आशय यह है कि सारा मामला ठोस तथ्यों पर नहीं धारणाओं पर टिका हुआ है और धारणाएं
घनघोर सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं.
कानूनी पैमाने पर कानून कितना कमजोर है, उसे इस बात से भी समझ सकते हैं कि जब 2025 में उत्तराखंड सरकार ने इस कानून का संशोधित प्रारूप उत्तराखंड के राज्यपाल के पास अनुमोदन के लिए भेजा तो कानूनी परीक्षण में विफल रहने पर राज्यपाल को इसे सरकार को लौटाने को मजबूर होना पड़ा.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दिए गये आंकड़े यह बताने के
लिए पर्याप्त हैं कि धर्मांतरण का वितंडा सिर्फ अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए
खड़ा किया गया है. सत्ता के दम पर उस वितंडा को कानूनी जामा भी पहना दिया गया, लेकिन
कानून के कठघरे में खड़ा होते वह धराशायी हो रहा है. यह अफ़सोसजनक है कि इस प्रक्रिया में जिन्हें उत्पीड़न झेलना पड़ रहा
है, वे सिर्फ संख्या या आंकड़ा भर नहीं हैं, जीते-जागते इंसान हैं, जिनके लिए
प्रक्रिया ही सजा बन जाती है ! संभवतः यह परपीड़न का सुख ही सांप्रदायिक राजनीति का
उद्देश्य है !
-इन्द्रेश मैखुरी



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इन कुकर्मियों का एजेंडा सिर्फ साम्प्रदायिक हिंसा है ताकि ये समाज को बाँट कर सत्ता में बने रहें
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