एक पुरानी कहावत है- नाम हो, बदनाम हो पर गुमनाम
ना हो ! इससे आगे बढ़ी हुई एक और कहावत है- बदनाम हुए तो क्या नाम ना होगा ! लगता
है गुमनामी से बचने के लिए बदनाम हो कर नाम करने के मिशन पर उत्तराखंड के
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पूरे मनोयोग से लगे हुए हैं.
अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में एक थिंक टैंक है, जिसका नाम है- सेंटर
फॉर द स्टडी ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड हेट ( CSOH
). यह केंद्र दुनिया भर में जहां भी घृणा है, घृणा का प्रसार है, उस पर रिपोर्ट जारी
करता है ताकि धर्म, नस्ल, लिंग आदि के आधार पर
की जा रही घृणा के खिलाफ माहौल बने.
हाल ही में इसी थिंक टैंक- सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड हेट ( CSOH ) द्वारा एक रिपोर्ट
जारी की गयी, जिसका शीर्षक है- “
हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया- रिपोर्ट 2025 “.
इस रिपोर्ट में वर्ष 2025 में भारत में हुए सांप्रदायिक घृणा वाले भाषणों
का लेखा- जोखा है.
यह रिपोर्ट बताती है कि 2025 में भारत के 21
राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कुल
1318 नफरती भाषण की घटनाएं दर्ज की गयी, जो कि 2024 से 13 प्रतिशत अधिक थी और 2023 से तो नफरत भरे भाषणों की तादाद में
97 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी. 2023 में नफरत भरे भाषणों वाले आयोजन की संख्या
668 दर्ज हुई थी. रिपोर्ट के अनुसार 2025 में
एक दिन में औसतन चार नफरत भरे
भाषणों वाले आयोजन हुए.
रिपोर्ट का लिंक :
https://www.csohate.org/wp-content/uploads/2026/01/Hate-Speech-Events-in-India-2025-3.pdf
अधिकांश घृणा भरे भाषणों का निशाना मुसलमान थे और
उसके एक अंश के निशाने पर इसाई भी थे.
रिपोर्ट में रिकॉर्ड किये गए कुल 1318 नफरत भरे भाषणों में से 1156
मुस्लिमों के खिलाफ दिए गए, ऐसे नफरत भरे भाषण, जिनमें मुसलामान और इसाई दोनों को निशाना बनाया गया, उनकी संख्या दर्ज की
गयी है- 133 और सिर्फ इसाइयों को निशाना बनाने वाले नफरती भाषणों की संख्या है-
29.
रिपोर्ट बताती है कि 1164 नफरती भाषणों वाली घटनाएं
ऐसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई, जहां या तो भाजपा की सरकार है या
भाजपा, गठबंधन सहयोगियों के
साथ सत्ता में है. यह कुल नफरत भरे
भाषणों का 88 प्रतिशत है और 2024 में दर्ज की गयी
नफरत भरे भाषणों की घटनाओं में 25 प्रतिशत की वृद्धि है. 2024 में इन
राज्यों में 931 नफरत भरे भाषणों की घटनाएं दर्ज की गयी थीं.
रिपोर्ट बताती है कि सात विपक्ष शासित राज्यों में
नफरत भरे भाषणों की कुल संख्या 2025 में 154 दर्ज हुई जो 2024 में दर्ज नफरत भरे
भाषणों की कुल 234 घटनाओं के मुकाबले 34 प्रतिशत कम हैं.
रिपोर्ट के अनुसार 308 भाषणों ( 23 प्रतिशत) में
खुले तौर पर हिंसा का आह्वान किया गया था जबकि 136 भाषणों में हथियार उठाने का
सीधा आह्वान था. हिंसा के आह्वान वाले भाषणों में 19 प्रतिशत और सामाजिक व आर्थिक
बहिष्कार वाले भाषणों में 2024 के मुकाबले 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी.
रिपोर्ट यह भी स्पष्ट तौर
पर कहती है कि घृणा के इस पूरे तंत्र ने अपना अत्याधिक संगठित चरित्र 2025 में भी
कायम रखा. इसका साफ़ अर्थ यह है कि यह घृणा अनायास नहीं है बल्कि यह तो संगठित
अभियान के तौर पर चलाया जा रहा है. रिपोर्ट बताती है कि 2025 में सर्वाधिक नफरत
भरे भाषणों वाले आयोजन करने में 289 आयोजन के साथ विश्व हिंदू परिषद-बजरंग दल पहले
नंबर पर थे, दूसरे नंबर पर प्रवीण
तोगड़िया के संगठन- अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद-राष्ट्रीय बजरंग दल थे, जिन्होंने नफरत भरे भाषणों वाले 138 आयोजन किये. नफरत
भरे भाषणों वाले आयोजन करने में सत्ताधारी भाजपा 133 आयोजनों के साथ तीसरे नंबर पर
रही.
नफरत भरे आयोजन और उनके
आयोजकों को देख कर यह स्पष्ट है कि इसका राजनीतिक लाभार्थी कौन होगा.
तथ्य तो अभी और भी कई सारे
हैं पर अब उस बात पर आते हैं, जिसका जिक्र इस लेख के शीर्षक और शुरुआत में किया गया है.
रिपोर्ट बताती है कि
सर्वाधिक नफरत भरे भाषण वाले आयोजनों के मामले में उत्तर प्रदेश ( 266) , महाराष्ट्र (193) और मध्य प्रदेश (172) के बाद
उत्तराखंड (155) का चौथा नंबर है. इस मामले में उत्तराखंड ने दिल्ली (76) को काफी
पीछे छोड़ दिया है.
रिपोर्ट के अनुसार
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 2025 में बहुतायत में नफरत भरे भाषण
देने वालों में अग्रणी रहे. रिपोर्ट में दर्ज है कि 2025 में उन्होंने 71 नफरत भरे
भाषण दिए. उनके बाद दूसरा नंबर अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के मुखिया प्रवीण
तोगड़िया का है, लेकिन उनके कुल दर्ज नफरत
भरे भाषणों की संख्या 46 को देखें तो वो धामी से काफी पीछे नजर आते हैं. तीसरे
नंबर पर भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय हैं, जिनके नफरत भरे भाषणों की संख्या रिपोर्ट में 35 दर्ज
की गयी है. दूसरे और तीसरे नंबर पर जो लोग हैं, ख़ास तौर पर दूसरे नंबर वाले, उनका तो ऐसे भाषण देना ही एकमात्र काम है, दशकों से वो यही कर रहे हैं, यही उनकी विशेषज्ञता है. लेकिन पुष्कर सिंह धामी
मुख्यमंत्री भी हैं, उन्हें राजकीय काम भी करने
पड़ते होंगे, इसके बावजूद उन्होंने, इन प्रोफेशनल लोगों को पछाड़ दिया ! अमित शाह, योगी आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी और हिमंता बिस्व सरमा भी
इस मामले में धामी से किलोमीटरों पीछे हैं, इस उपलब्धि का जश्न मनाया जाए कि इस पर सिर पीटा जाए ?
राज्य चौथे नंबर पर है और
मुख्यमंत्री पहले नंबर पर हैं तो इसका आशय यह है कि बाकी और क्षेत्रों में हो ना
पर नफरत भरे भाषणों के मामले में तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आगे बढ़ कर
नेतृत्व कर रहे हैं !
पुष्कर सिंह धामी के भाषण
आप सुनिए तो लगता है कि वे रोज नए किस्म का जेहाद इजाद कर रहे हैं. लेकिन यह
रिपोर्ट देख कर समझ में आता है कि जेहादों की सूची धामी जी के पास भी कहीं और से
ही अग्रसारित यानि फॉरवर्ड हो कर आती है. इस मामले में वे भी व्हाट्स ऐप
यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी ही मालूम पड़ते हैं. हालांकि उनके गुरुजनों ने जितने
जेहाद इजाद कर दिए हैं, ऐसा लगता है कि नफरत भरे भाषण देने में अव्वल आने के बाद भी धामी जी को जेहाद
के सब प्रकार सीखने में काफी वक्त लगेगा !
यह अलग बात है कि रिपोर्ट में उनको “लव जेहाद” , “लैंड जेहाद”, “थूक जेहाद” जैसी कांस्पिरेसी थ्योरीज का मुख्यधाराकरण
करने का श्रेय दिया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार पुष्कर
सिंह धामी ने सिर्फ उत्तराखंड में ही नफरत भरे भाषण नहीं दिए बल्कि दिल्ली हो या
बिहार, जहां भी भाजपा ने उनको स्टार प्रचारक बना कर भेजा, वहां उन्होंने नफरत ही उलीची !
इन नफरत भरे भाषणों का ही प्रोत्साहन
है कि उत्तराखंड में आये दिन सांप्रदायिक घृणा और उन्माद की घटनाएं हो रही हैं. बीते
कुछ दिनों में कश्मीरी शॉल बेचने वालों पर जानलेवा हमले से लेकर बाबा बुल्ले शाह
की मज़ार में तोड़फोड़ तक, एक अनवरत सिलसिला है, सांप्रदायिक उन्माद और उत्पात की
घटनाओं का. पुलिस भी प्रभावी कार्रवाई नहीं करती क्यूंकि जब मुखिया ही आये दिन
नफरत भरे भाषणों को अपनी यूएसपी समझे तो छोटे-मोटे प्यादों पर कार्रवाई कैसे होगी ?
बीते दिनों बड़े भोलेपन के
साथ पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि एक रिपोर्ट में उन्हें सबसे ज्यादा हेट स्पीच देने
वाला बताया गया है, लेकिन उन्होंने तो कभी
किसी से हेट की ही नहीं ! इस भोलेपन पर कौन न मर जाए, ऐ खुदा, क़त्ल भी करते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं !
फिर उन्होंने कुछ घिसे
पिटे जुमले दोहराए कि यदि ऐसा..ऐसा..ऐसा.. करने को हेट स्पीच कहा जा रहा है तो वे
ऐसा करते रहेंगे ! अपने बयान के जरिये पुष्कर सिंह धामी ने यह माहौल बनाने की
कोशिश की कि किसी अंजान एनजीओ ने उनके “जनहित के कार्यों” को हेट स्पीच बता कर, उनके साथ बड़ी नाइंसाफी कर दी है ! एक तो सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड हेट कोई अनजान या गुमानम संगठन नहीं है
बल्कि अमेरिका समेत पूरी दुनिया में हर
तरह के घृणा अभियानों के खिलाफ काम करने वाला संगठन है. दूसरा यह धामी साहब, हेट स्पीच को चिन्हित करने के लिए उक्त
संगठन ने संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा का प्रयोग किया है. संयुक्त राष्ट्र संघ के यू एन स्ट्रेटजी एंड प्लान ऑफ़ एक्शन ऑन हेट स्पीच के
अनुसार “किसी भी प्रकार के संचार जैसे बोलने , लिखने या व्यवहार से , जो किसी व्यक्ति या समूह की पहचान के कारकों जैसे कि उनके धर्म,
जातीयता,
राष्ट्रीयता,
नस्ल,
रंग,
वंश,
लिंग या अन्य के आधार पर—उन पर हमला करता है या अपमानजनक या भेदभावपूर्ण भाषा का उपयोग
करता है,” उस व्यक्ति के लिखे-बोले को हेट स्पीच कहते हैं.
तो धामी जी, आप खुद को
कितना ही मासूम, भोला और राज्य हितैषी क्यों ना
दिखाने की कोशिश करो, लेकिन संयुक्त
राष्ट्र संघ द्वारा तय की गयी हेट स्पीच की वैश्विक परिभाषा की कसौटी पर कसने के
आधार पर ही आपके भाषणों को नफरत भरा करार दिया गया है. यह मुस्कुराने नहीं
शर्मिंदा होने की बात है, मुख्यमंत्री जी ! नफरत भरे भाषण देकर आदमी धाकड़ नहीं
नफरती चिंटू कहलाता है !
-इन्द्रेश मैखुरी

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