cover

सोनम वांगचुक : सत्ता की सनक के लिए न छिने नागरिक स्वतंत्रता !

 

अंततः राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जोधपुर जेल में बंद लद्दाख़ के पर्यावरण कार्यकर्ता, इंजीनियर, शिक्षाविद सोनम वांगचुक पर से केंद्र सरकार ने रासुका वापस लेने और उन्हें रिहा करने का फैसला किया है. रासुका वापस लेते हुए केंद्र ने तर्क दिया है कि रासुका के तहत निर्धारित सजा की आधी अवधि वांगचुक पहले ही भुगत चुके हैं. यह खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे जैसा तर्क है ! यह तर्क या कुतर्क बताता है कि केंद्र सरकार के लिए उन्हें अधिक जेल में रख पाना मुश्किल होता जा रहा था, इसलिए उन्हें रिहा किया गया. जो सरकार सोनम वांगचुक के खराब स्वास्थ्य पर भी उच्चतम न्यायालय में कुतर्क कर रही थी कि उन्हें जेल में होने की वजह से अच्छा इलाज मिल रहा है, लद्दाख़ में क्या मिलता, वही सरकार बिना कोई ठोस वजह बताए, उन्हें रिहा कर रही है तो समझ सकते हैं कि कैसे झूठे आधारों पर वांगचुक को छह महीने तक कैद रखा गया ! लद्दाख़ आंदोलन की सभी अन्य गिरफ्तार आंदोलनकारियों को भी रिहा किया जाना चाहिए, सभी राजनीतिक बंदियों की भी रिहाई होनी चाहिए.





एक फासिस्ट हुकूमत कैसे लोकतांत्रिक स्वरों को कुचलती है, इसका नूमना है, लद्दाख़ में सितंबर 2025 में किया गया दमन ! लद्दाख़ को अलग राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल किये जाने जैसी बेहद लोकतांत्रिक मांगों के लिए न केवल वांगचुक पर रासुका लगाया गया बल्कि उनके देश विरोधी होने का झूठा प्रचार भी चलाया गया. इस सरकार की तानाशाही का अंदाज इस बात से लगा सकते हैं कि एक व्यक्ति जो मोदी विरोधी भी नहीं है, उसको सिर्फ छह महीने से सिर्फ इसलिए कैद रखा कि वो अपने इलाके की वाजिब मांगों और जायज चिंताओं को प्रकट कर रहा है. इसका अर्थ साफ है कि इस हुकूमत के लिए किसी का भी मोदी समर्थक होना ही काफी नहीं है, उसे अपने आसपास के वाजिब मसलों पर मुंह और आंखें भी बंद रखनी होगी, तभी वो सुरक्षित रह सकता है ! वे लोकतंत्र को सिर्फ यहीं तक सीमित कर देना चाहते हैं कि सिर्फ मोदी का जयकारा लगाने का ही अधिकार व्यक्ति के पास शेष रहे ! 

उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार को टिप्पणियों में कई बार कठघरे में खड़ा किया, जैसे सोनम वांगचुक के तीन- चार मिनट के भाषण के दस मिनट लंबे अनुवाद के मामले में. लेकिन अफसोस कि केंद्र सरकार के इस कृत्य को अदालत अवैध घोषित न कर सकी.

Habeas Corpus यानि बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका में बंदी को प्रत्यक्ष प्रस्तुत करने का मामला यदि कुछ मामूली कानूनी नुक्तों में छह महीने खिंच जाए और फिर भी उस पर फैसला न हो पाए तो बंदी प्रत्यक्षीकरण का यह अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 32 में मौलिक अधिकार है, वो सिर्फ कागजों में ही रह जाएगा ! 

नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई को और तेज करने की आवश्यकता है. सत्ता की सनक के लिए किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता को छीना जाना, कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता है.

-इन्द्रेश मैखुरी



Post a Comment

0 Comments