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भाई अखबार वालो, तुम क्यों हलकान हो !

 

खबर है कि "मुख्यमंत्री बदलने की अफवाह फैलाने के लिए तीन फेसबुक पेज संचालकों के खिलाफ देहरादून पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है." पता नहीं जिन्होंने रिपोर्ट लिखवाई और जिन्होंने दर्ज की, उनमें से किसी ने पोलिटिकल गॉसिप शब्द सुना था या नहीं. पर ऐसी चर्चाओं, जिन्हें अफवाह बताया जा रहा है, को प्रदेश में आई आपदा से भी खतरनाक मानते हुए, तुरत- फुरत एफआईआर दर्ज कर ली गई. 


अखबारों ने लिखा है कि मुख्यमंत्री बदलने की अफवाहों से आपदा में राहत और बचाव कार्य पर प्रभाव पड़ता है ! 


अमर उजाला ने खबर में इस बात को किसी के हवाले से नहीं लिखा बल्कि अपनी तरफ से लिखा है.अमर उजाला ने लिखा है - " माना जा रहा है कि प्रदेश भारी आपदाओं से जूझ रहा है. ऐसे में मुख्यमंत्री बदलने जैसी झूठी खबरें न केवल राहत एवं बचाव कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करती हैं बल्कि सरकारी कामकाज और प्रशासनिक व्यवस्था को भी प्रभावित करती है."






यही बात हिंदुस्तान ने देहरादून के एसएसपी अजय सिंह के मुंह से कहलवाई है. बकौल हिंदुस्तान - "एसएसपी अजय सिंह ने बताया कि इस प्रकार की अफवाह से न केवल राहत और बचाव कार्यों में व्यवधान आता है, बल्कि सरकारी कामकाज और प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित होती है।"






अब ये तो अमर उजाला और हिंदुस्तान ही बता पायेंगे कि यह बात उनके संवाददाता ने अपनी बुद्धि से लिखी या फिर एसएसपी अजय सिंह ने कही ! 


वैसे एक जैसे वाक्य विन्यास को देख कर लगता है कि अमर उजाला और हिंदुस्तान दोनों के पास ही वाक्य कहीं और से लिख कर आया और हिंदुस्तान वालों ने एसएसपी साहेब की नज़रों में थोड़ा ज्यादा ऊपर चढ़ने के लिए , उनके मुंह से बाकायदा अलग से बॉक्स में कहलवा दिया ! 


अमर उजाला ने वाक्य की शुरुआत गज़ब की है, लिखते हैं - "माना जा रहा है कि प्रदेश भारी आपदाओं से जूझ रहा है." माना जा रहा है- का क्या मतलब है भाई अमर उजाला वालो, वास्तव में नहीं जूझ रहा है, क्या ? तुमने ही तो फ्रंट पेज पर खबर छापी है आज कि "166 सड़कें बंद, 155 गांव अंधेरे में"


अमर उजाला और हिंदुस्तान वालो, यह वाक्य या खबर आपके पास जहां से भी लिख कर आई और आपने आंख बंद कर कॉपी- पेस्ट कर दी, पर भाई लोगो जरा यह बताओ कि इससे आपदा में राहत और बचाव कार्य कैसे प्रभावित होता है ? क्या मुख्यमंत्री को भी ऐसी खबरों से ऐसा लगने लगता है कि अब तो मुझ पर ही आपदा आई है तो मैं दूसरों को बचाऊं कि खुद को बचाऊं ! या इस राज्य की प्रशासनिक मशीनरी इतनी संवेदनहीन है कि वो आपदा के मारे लोगों का राहत- बचाव छोड़ कर -कौन बनेगा मुख्यमंत्री- खेलने लगेगी ! 


अरे भाई अखबार वालो, माना कि अखबार के काग़ज़ से लेकर अखबार छापने का खर्च तक, विज्ञापन की शक्ल में, सरकार ही देती है पर सरकार की भक्ति में इस कदर न बिछ जाओ भाई कि बुद्धि लगाए बिना, उस सरकार को अफवाहों से थरथर कांपता ही प्रदर्शित कर दो ! जिस सरकार का मुखिया और प्रशासनिक मशीनरी अफवाहों या गॉसिप से ही थरथराने लग जाएं, ऐसी सरकार बनी भी रहे तो किस काम की ! अरे मीडिया वालो तुमने ही तो बताया कि मुख्यमंत्री तो धाकड़ है तो यह कैसा धाकड़ है भाई, जिसके चेहरे पर पोलिटिकल गॉसिप से ही हवाइयां उड़ने लगी हैं ! 


-इन्द्रेश मैखुरी





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