18 सितंबर 2022 को हुए अंकिता भंडारी हत्याकांड के
तीन साल बाद भी इस मामले में हत्या का कारक बताए जाए रहे वीआईपी के खुलासे और उन्हें
कानून के कठघरे में खड़ा करने की आवाज़ यदि लगातार जिंदा है तो इसमें उत्तराखंड के
न्याय पसंद लोगों के साथ ही सबसे अग्रणी भूमिका है, अंकिता भंडारी की माता- श्रीमती सोनी देवी और
अंकिता के पिता- श्री वीरेंद्र सिंह भंडारी की. बेहद साधारण या यूं कहिये कि कमजोर
आर्थिक पृष्ठभूमि वाली यह दंपत्ति जिस दिलेरी की साथ, सत्ता के तमाम दबावों
के सामने दृढ़तापूर्वक खड़ी है, वो अपने-आप में जबरदस्त है.
14 जनवरी 2026 को बागेश्वर के सरयूबगड़ में इसी
तारिख पर 1921 में अंग्रेजों के कुली-बेगार के रजिस्टरों को सरयू नदी में बहा देने
वाले संग्रामियों की याद करते हुए एक्टिविस्ट पत्रकार त्रिलोचन भट्ट, जन संस्कृति मंच के
राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य मदनमोहन चमोली और मैंने “अंकिता न्याय यात्रा” का पहला
चरण शुरू किया. इसमें बागेश्वर के संघर्ष वाहिनी और सवाल संगठन के साथियों, गरुड़ में कांग्रेस के
साथियों, संस्कृतिकर्मियों, देवाल, थराली, कुलसारी में स्थानीय
लोगों, पत्रकारों, भाकपा(माले) के
साथियों, कर्णप्रयाग में
व्यापार मंडल, परिवर्तन यूथ क्लब
और माकपा के साथियों, जोशीमठ में जनांदोलनों के प्रमुख नेता कॉमरेड अतुल सती समेत भाकपा(माले) के
साथियों व श्रीनगर (गढ़वाल) में आइसा, भाकपा (माले) व जस्टिस फॉर अंकिता कमेटी के साथियों ने अभियान को सफल बनाने व
सभाओं के आयोजन में भरपूर योगदान दिया. इस पूरी यात्रा का विवरण त्रिलोचन भट्ट जी
के यूट्यूब चैनल- बात बोलेगी – पर वीडियो के रूप में मौजूद है.
https://www.youtube.com/watch?v=EoXqxrh6X8s
अभियान के इस चरण के समापन के लिए एक्टिविस्ट-पत्रकार त्रिलोचन भट्ट जी और मैं, अंकिता भंडारी के गांव- पौड़ी जिले के डोभ-श्रीकोट पहुंचे. सड़क मार्ग से इस गांव पहुंचने के लिए मल्ली-बरसूड़ी मोटर मार्ग से जाना पड़ता है. तीन साल पहले यानि सितंबर 2022 में इस मोटर मार्ग की जैसी दशा थी, वैसी ही आज भी है.
ऐसा लगता है कि सड़क को काट करके छोड़ दिया गया है. अंकिता
भंडारी के नाम पर उत्तराखंड की भाजपा सरकार द्वारा किये जा रहे तमाम बड़बोले दावों
की हकीकत, इस सड़क को देख कर भी समझी जा
सकती है.
सड़क से कुछ नीचे उतर के ही वह घर है, जिसमें अंकिता भंडारी
पली-बढ़ी और जहां अब उसके न्याय की आस में रात-दिन जूझते उसके माता-पिता रहते हैं.
हम थोड़ा नीचे उतरे ही थे कि अंकिता भंडारी की माता-श्रीमती सोनी देवी, हमें एक घर में गांव
की एक महिला से बातचीत करती मिल गयी. परिचय होते ही वे हमारे साथ चल पड़ी. घर तक
पहुंचते-पहुंचते बातचीत का सिलसिला शुरू हो चुका था. वर्तमान में पेश आ रही
दिक्कतों से लेकर बीते तीन बरस के संघर्षों तक, सभी बातें वे लगातार हमें बता रही थी. ऐसा लग रहा था कि बहुत दिनों बाद वे ऐसे
लोगों से बोल-बतिया रही हैं, जो फोटो-वीडियो के बिना उनसे बात कर रहे हैं. फोटो-वीडियो-बाईट वालों से वे
काफी त्रस्त थीं, बोली- खाना बनाने का वक्त भी नहीं मिल पाता, इतने लोग आ जाते हैं. हम बिना कैमरा खोले, उनसे बात कर रहे थे, इसलिए वे अगले दो-एक
घंटे धाराप्रवाह तरीके से तमाम बातें, हमसे करती रही. हमने महसूस किया कि खुल करके बात करने से तमाम तनाव और गुबार
से वे भी थोड़ा मुक्त हुई. जब हम पहुंचे तब उनके पति श्री वीरेंद्र सिंह भंडारी, दवाई लेने गए हुए और
बाद में वे भी बातचीत में शामिल होते हैं.
सोनी देवी बताती हैं कि उनके पास एक गाय है, उसकी एक बछिया भी है
और कहीं आने-जाने में उस का प्रबंध करना मुश्किल हो जाता है. इसलिए अस्पताल इलाज
कराने जाना तक भी उनके लिए मुश्किल हो रहा है. गांव में ही वे अन्य लोगों से गाय
को देखने में मदद मांगने गयी थी पर गांव में एक तो लोग कम हैं, फिर बाघ-भालू का
ख़तरा भी बना हुआ है, इसलिए भी दूसरे के जानवरों की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता. पलायन और जंगली
जानवरों का आतंक ऐसा सवाल है, जिससे पूरा पहाड़ जूझ रहा है और सरकार, इस मामले में समय-समय पर रस्मी बयानबाज़ी से काम चलाती रहती हैं.
सोनी देवी कहती हैं कि इस महीने (जनवरी 2026) के
शुरू में जब अचानक उन्हें मुख्यमंत्री के यहां से बुलावा आया, तब भी गाय के देखरेख
की कोई व्यवस्था नहीं हुई और उन्हें गाय को ताले में बंद करके जाना पड़ा. वे कहती
हैं- जब तीन दिन बाद वो लौटे तो गाय उनके कदमों की आवाज़ सुन कर रंभाई, उन्होंने गौशाला का
दरवाज़ा खोला. वे कहती हैं कि गाय की हालत देख कर वे दोनों- पति-पत्नी देर तक उसे
सहलाते रहे, उसको गले लगा कर
रोते रहे ! रोजमर्रा के जीवन का यह अलग
संघर्ष है, जिससे उनको अकेले ही
जूझना है !
समाज के बड़े हिस्से के साथ खड़े होने के बावजूद
जूझना तो बहुत सारी बातों से उन्हें अकेले ही है ! श्रेय लेने की होड़ में लगे तमाम
दावेदारों को इस बात को जरुर ध्यान में रखना चाहिए कि श्रेय का तमगा चाहने वाले
कितने ही बड़े रथी- महारथी क्यूं ना हों, लेकिन जो इन दो लोगों ने खोया है, वो और किसी ने नहीं गंवाया है. अपने घर में उन तमाम स्मृतियों से वो रोज
दो-चार होते हैं, जो उनकी उस बेटी की हैं, जो सिर्फ इसलिए क़त्ल कर दी गयी, चूंकि उसने वीआईपी बताए जा रहे, सफ़ेदपोश वहशी दरिंदों के हवस का चारा बनने से इंकार कर दिया था.
सोनी देवी कहती हैं- उन्हें कुत्ते- बिल्ली पसंद
नहीं हैं, लेकिन अंकिता को
बहुत पसंद थे, इसलिए अब वे गाय ही
नहीं बिल्ली भी पाल रही हैं !
अंकिता भंडारी के नाम पर की गयी बड़ी-बड़ी सरकार घोषणाओं की हकीकत, आप उनके घर जा कर देख सकते हैं. सड़क का हाल शुरू में बयान किया ही जा चुका है. एक पुराना मकान है, जो इन मां-बाप की तरह वक्त के थपेड़े झेलता हुआ, उदास खड़ा दिखाई देता है.
मई 2025 में जब अंकिता भंडारी हत्याकांड में अपर सत्र न्यायाधीश कोटद्वार की अदालत ने फैसला सुनाया तो उस वक्त मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की शेखी बघारने के लिए एक पोस्टर जारी किया गया.
उक्त पोस्टर में अन्य दावों के अलावा यह भी दावा किया गया था कि उत्तराखंड की
भाजपा सरकार ने अंकिता भंडारी के पिता और भाई को सरकारी नौकरी दी है. यह कोरा झूठ
है. अंकिता का भाई सीए करने के बाद दिल्ली में प्राइवेट नौकरी कर रहा है. अंकिता
की माता-सोनी देवी अन्य संदर्भ में बातचीत के प्रवाह में कहती हैं कि वे स्वयं एमए, बी.एड, डी.एल.एड हैं और अतीत में पौड़ी के एक प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल में
अध्यापन कार्य कर चुकी हैं. डोभ-श्रीकोट स्थित राजकीय नर्सिंग कॉलेज का नाम अंकिता
भंडारी के नाम पर करने की घोषणा 16 सितंबर 2023 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
ने की थी पर हुआ कुछ नहीं.
अंकिता भंडारी प्रकरण में दो भाजपा नेताओं- दुष्यंत कुमार गौतम और अजय कुमार का नाम वीआईपी के तौर पर उछलने के बाद खड़े हुए आंदोलन से पार पाने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 8 जनवरी 2026 को यह घोषणा, नयी घोषणा के तौर पर फिर दोहरा दी.
तब जा कर 12 जनवरी 2026 को उक्त सरकारी नर्सिंग कॉलेज का नाम अंकिता भंडारी के नाम पर किया जा सका.
फोटो : त्रिलोचन भट्ट
नाम
बदलने जैसे साधारण काम के लिए जब तीन साल लगें और मुख्यमंत्री को दो बार घोषणा
करनी पड़ती हो, सोचिये उस सरकार में
न्याय की डगर कितनी कठिन होगी, खासतौर पर तब, जबकि वीआईपी के तौर पर मुख्यमंत्री की पार्टी के दो नेताओं का नाम, उन्हीं की पार्टी से
संबंद्ध लोगों ने लिया है.
उनकी बेटी को न्याय मिलना चाहिए, इसके लिए ये दोनों
माता-पिता बिल्कुल कटिबद्ध हैं. सोनी देवी कहती हैं, जब तक जीवन है, तब तक वे न्याय के लिए लड़ते रहेंगे ! वे कहती हैं कि जब बहुत खराब स्थिति भी
होती है, तब अंकिता से ही
उनको वो साहस मिलता है, जो उनको दोबारा से खड़ा करता है. दोनों ही- सोनी देवी और वीरेंद्र भंडारी- इस
बात पर ज़ोर देते हैं कि ये हमारी बेटी की लड़ाई तो है, लेकिन यह पहाड़ की
तमाम बेटियों की लड़ाई भी है. एक तरह से परिस्थितियों ने यह लड़ाई लड़ने के लिए उनका
चुनाव किया है और वे जब तक जीवन है, तब तक यह लड़ाई लड़ेंगे ! तमाम
छल-छद्म-फरेब करने वाली सत्ता के लिए इस जज्बे से पार पाना भारी पड़ रहा है. सोनी
देवी कहती हैं कि इस लड़ाई में उनके अपने पीछे छूट गए और अंजान लोग अपने होते चले
गए. रीजनल रिपोर्टर की संपादक गंगा असनोड़ा ने इस बात की व्याख्या की और इस मामले
में कानूनी लड़ाई बेहद शिद्दत से लड़ने वाले हाईकोर्ट के अधिवक्ता नवनीश नेगी ने भी
तस्दीक की कि हुआ यूं कि इस प्रक्रिया में जब ये माता-पिता सरकार के दबाव में नहीं
आये तो सरकार ने इन पर करीबों लोगों के जरिये दबाव बनाया होगा. जब उनके दबाव में
भी ये नहीं आए तो जाहिर सी बात है कि उन्होंने किनारकशी कर ली होगी. इसी बात को
सोनी देवी काव्यात्मक तरीके से व्यक्त कर रही हैं कि इस लड़ाई में उनके अपने पीछे
छूट गए और अंजान लोग अपने होते चले गए !
वे अपनी बेटी के साहस और बलिदान का मोल अच्छी तरह
समझते हैं. सोनी देवी कहती हैं- मेरी बेटी बड़ी साहसी थी,वो उनके सामने नहीं झुकी है.
झुक जाती तो जिंदा होती, कुर्सी पर बैठी होती, हो सकता है- मंत्री ही हो जाती. अंकिता भंडारी के बलिदान, साहस और चरित्र की
मजबूती को रेखांकित करते हुए अनायास ही सोनी देवी ने उस क्षुद्र, दूषित, कलुषित राजनीति पर
भी करारा तमाचा मार दिया, जिसमें स्त्रियों का भोग की वस्तु बनाना स्वीकार करना ही उनके आगे बढ़ने का
रास्ता खोलता है. ऐसी राजनीति का तो हर
हाल में ध्वंस करना आवश्यक है. अंकिता को याद करते हुए सोनी देवी कहती हैं- जब वो
नहीं झुकी तो हम कैसे झुक जाएं ! यह वाक्य न्याय की लड़ाई का बहुत बड़ा संबल है !
-इन्द्रेश मैखुरी






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