पहाड़ में चारों तरफ तबाही का मंज़र है. कहीं बादल फटने के चलते लोगों, पशुओं, घरों के बहने की खबर है तो कहीं नदी सड़क पर आ गयी है. चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, बागेश्वर, जहां देखिये वहां आपदा की मार झेलते लोग हैं.
हुक्मरानों से सवाल पूछिये तो कह देंगे कि प्राकृति के सामने कोई क्या कर सकता है. बिल्कुल सही बात है. लेकिन यह तुम उस वक्त क्यों नहीं सोचते जब तुम विकास के नाम पर उस प्रकृति को, पर्यावरण को, पारिस्थितिकी को तहस- नहस करते हो. पहाड़ की ऊंचाइयों से लेकर नदी तल तक के बेतहाशा दोहन करते हुए ख्याल नहीं आता कि इन तमाम चीजों के प्राकृतिक स्वरूप को बिगाड़ेंगे तो अंजाम बर्बादी होगा ?
बड़े जोरशोर से ऐलान किया गया कि सड़क को ऑल वेदर कर देंगे. 2016 में इस ऐलान से पहले उस सड़क पर इक्का- दुक्का जगहें थी, जहां भूस्खलन होता था. आज सैकड़ों भूस्खलन के ज़ोन हैं, जो कभी कभी तो चटक धूप में भी इस सड़क पर मलबे का पूरा पहाड़ ले आते हैं और आवागमन ठप्प हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट में इस सड़क को बेतरतीब काट कर चौड़ा करने के पीछे देश की सीमाओं तक जल्दी पहुँचने का तर्क दिया गया. उत्तरकाशी से सीमा को जाने वाला रास्ता 5 अगस्त से बंद है. सेना और सीमा के नाम पर वोट बटोरने वालों के लिए इस खोल पाना दूर की कौड़ी बना हुआ है. इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त चमोली जिले के नीती से बॉर्डर को जाने वाली सड़क भी बंद है. यह सड़क भी पहाड़ की हालत देखे बिना, बेतरतीब चौड़ी किये जाने की खब्त के चलते अक्सरहां बंद होती रहती है.
एक और रटा- रटाया जवाब विकास के नाम पर विनाश करने वालों के पास होता है- जहां विकास होता है, वहां थोड़ा विनाश भी होता ही है ! एक तो यह कि विनाश थोड़ा कतई नहीं हो रहा है. दूसरा जिनका विकास हो रहा है और विकास की मार से जिनका विनाश हो रहा है- वो एक ही नहीं है, अलग- अलग हैं. विकास हो रहा है- कॉरपोरेटों, बड़े ठेकेदारों, नेताओं, नौकरशाहों का और उसकी कीमत चुकाते हैं- आम लोग.
पुरानी कहावत है - बिच्छू का मंत्र नहीं जानते और चले हैं सांप के बिल में हाथ डालने !
नई कहावत होनी चाहिए - एक चट्टान का ठीक से पता नहीं और चले हैं पूरा हिमालय छेड़ने !
-इन्द्रेश मैखुरी
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