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स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च के मामले में फिसड्डी उत्तराखंड पर सरकारों को इससे सरोकार कहाँ !

 







 स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में अन्य हिमालयी राज्यों के मुक़ाबले  उत्तराखंड अपने हाथ बांधे हुए है. अध्ययन बता रहा है कि हिमालयी राज्यों में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में उत्तराखंड सबसे निचले पायदान पर है.


यह जानकारी सामने आई है, सोशल डिवैलपमेंट फॉर कम्यूनिटीज़ (एसडीसी) फ़ाउंडेशन के अध्ययन में. प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल के नेतृत्व वाले एसडीसी फ़ाउंडेशन ने हिमालयी राज्यों में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च को लेकर फ़ैक्टशीट जारी की है.






एसडीसी फ़ाउंडेशन द्वारा वर्ष 2017 से लेकर 2019 के बीच हिमालयी राज्यों द्वारा स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च के आंकड़ों के अनुसार, जहां इन तीन सालों में अरुणाचल प्रदेश ने स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति 28417 रुपये खर्च किए तो उत्तराखंड में यह खर्च महज 5887 रुपये था. हिमाचल प्रदेश ने इस अवधि में इस मद में उत्तराखंड से दोगुना खर्च किया.


हालांकि एसडीसी की फ़ैक्टशीट यह भी बताती है कि स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च का राष्ट्रीय औसत इन दस हिमालयी राज्यों की तुलना में बेहद कम है. हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों का स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च, राष्ट्रीय औसत से लगभग तीन गुना अधिक है.


10 हिमालयी राज्यों में स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में उत्तराखंड दसवें नंबर पर है. पर यह कोई पहला मौका नहीं, जब उत्तराखंड में स्वास्थ्य को लेकर सरकारी उदासीनता का आंकड़ा सामने आया है. बल्कि गाहे-बगाहे स्वास्थ्य सुविधाओं और उस पर व्यय को लेकर सरकारी उदासीनता की गवाही स्वयं सरकारी आंकड़े भी देते रहे हैं.


2018 के नेशनल हैल्थ अकाउंट के अनुसार उत्तराखंड में सकल घरेलू राज्य उत्पाद का 0.9 प्रतिशत सार्वजनिक खर्च ही चिकित्सा पर किया जाता है. 

 

2018 में प्रकाशित-उत्तराखंड मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के अस्पतालों में डाक्टरों की भारी कमी है. रिपोर्ट के अनुसार राज्य के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डाक्टरों के 55.78 प्रतिशत पद खाली हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में शल्य चिकित्सक यानि सर्जन के 92.77 प्रतिशत पद रिक्त हैं तो बाल रोग विशेषज्ञों के 82.50 पद रिक्त हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 91 प्रतिशत पद रिक्त हैं.  एक लाख की आबादी पर मात्र 2.58 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं,जबकि एक लाख की आबादी पर डाक्टरों की औसत संख्या 13.91 है.


उत्तराखंड में पलायन के अध्ययन के लिए उत्तराखंड सरकार द्वारा पलायन एवं ग्राम्य विकास आयोग बनाया गया.इस आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 8.83 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण पलायन करने को मजबूर हैं.

 

नीति आयोग द्वारा जून 2019 में विश्व बैंक और केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिल कर एक रिपोर्ट जारी की गयी,जिसका नाम है.  “हैल्दी स्टेट्स,प्रोग्रेसिव इंडिया”. नीति आयोग के इस हैल्थ इंडेक्स में उत्तराखंड उन राज्यों में शामिल था जिन्हें “लीस्ट परफार्मिंग स्टेट” यानि न्यूनतम प्रदर्शनकारी राज्य कहा गया. आयोग की रिपोर्ट में उत्तराखंड उन राज्यों में शामिल है,जिन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में कोई सुधार नहीं किया है. रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 में उत्तराखंड स्वस्थ्य सूचकांक में 21 राज्यों में 15 वें नंबर पर था और 2017-18 में दो स्थान नीचे खिसक कर 17वें स्थान पर आ गया. 


एसडीसी फ़ाउंडेशन की फ़ैक्टशीट में यह बात दर्ज है कि जिन राज्यों का स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च अधिक है, वे कोविड मैनेजमेंट भी ज्यादा बेहतर तरीके से कर पाये. उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की मार आम लोगों पर समय-समय पर पड़ती रहती है.  आंकड़े भी इस बदहाली की गवाही देते रहते हैं.  परंतु जिन पर स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने का जिम्मा है, उन्हें न लोगों की तकलीफ से सरोकार है, न आंकड़ों में फिसड्डी सिद्ध होने पर कोई अफसोस !


-इन्द्रेश मैखुरी

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