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कॉमरेड लेनिन की 150 वीं जयंती : जब एक सैनिक ने बर्फीले तूफान के बीच लेनिन को रोका !


आज विश्व की प्रथम समाजवादी क्रांति के महान नेता और समाजवाद निर्माण के सर्वप्रथम प्रयोग की शुरूआत करने वाले कॉमरेड लेनिन की 150 वीं वर्षगांठ है.इस मौके पर एक रोचक किस्से से कॉमरेड लेनिन को जानने की कोशिश करते हैं. 
आप भी जानिए,क्या हुआ जब एक सैनिक ने बर्फीले तूफान के बीच लेनिन को रोका :



साधारण दस्ताने

दादा आन्द्रेई के पास एक लकड़ी का सन्दूक है. उस सन्दूक में ढेर सारी रोचक चीजें हैं. उसमें लाल सेना का एक हेलमेट है,जिसे पहनकर दादा ने नवनिर्मित सोवियत देश के दुश्मनों से रक्षा की थी,उसमें एक पुराना इस्तेमाल हो चुका तंबाकू पाइप है-सैनिक की खुशिया हैं और बढ़ई के काम आने वाले विभिन्न प्रकार के औज़ार हैं.

और इन सब अजीबो-गरीब चीजों में खुरदुरे भेड़ की ऊन के बने सामान्य बुनाई वाले साधारण दस्तानों का जोड़ा है जो हर जगह से रफ़ू किया हुआ है. उन्होंने इन दस्तानों को संभाल कर क्यूँ रखा है?
आन्द्रेई के पोते-पोती जानने के लिए उत्सुक हो गए. वे सब कुछ जानना चाहते थे.
एक दिन दादा ने उन्हें बुलाया और कहा :
ठीक है,मैं तुम्हें बताता हूँ. मैं बताऊँगा कि ये दस्ताने कैसे हैं. और यह कोई साधारण कहानी नहीं है
1917 की सर्दियों में अक्टूबर क्रांति के ठीक बाद,मैं स्मोल्नी की एक चौकी पर खड़ा था जहां से पहली सोवियत सरकार सभी कार्य संचालित कर रही थी. मैं वहाँ तैनात था और नंगे हाथ में अपनी राइफल थामे हुए था. उन दिनों संतरियों के पास दस्ताने नहीं थे. वह बेहद मुश्किल भरा समय था-अत्याधिक ठंड और साधनों की कमी थी,उन दिनों. हमने हाल ही में बुर्जुवा वर्ग को उखाड़ फेंका था. वे हमारी राष्ट्रीय शक्ति से क्रोधित थे.
सभी संतरियों के प्रभारी,एक बहादुर नाविक ने मुझे चेतावनी दी-पूरी तरह चौकस रहो सैनिक,उस घर में स्वयं लेनिन हैं. तुम्हें पता होना चाहिए कि उनकी रक्षा कैसी करनी चाहिए.   
बिल्कुल मैं जानता हूँ.मैं कम उम्र का सैनिक हूँ लेकिन मैंने अक्टूबर की लड़ाइयों में भाग लिया था,सेना के कैडेटों के साथ लड़ा था. मेरी राइफल निशाना लगाने के लिए तैयार है. मैं पूरी तरह सावधान और चौकस हूँ. फिर भी उस रात कड़ाके की ठंड थी. आसमान से बर्फबारी हो रही थी. डंक की तरह चुभने वाली और भयंकर हवा हमारे हेलमेट को चीरे दे रही थी. हाथ ठंड से काँप रहे थे.
मैं ठंड से अकड़-सा गया था. मैं अपने पैर पटक रहा था,काँप रहा था और अपनी साँसों से हाथों की उँगलियों को गरम करते हुए सोच रहा था : “मैं फिर भी बेहतर स्थिति में हूँ,खाइयों और खुले मैदानों में हमारे सैनिकों की क्या स्थिति है.” मैं अपने स्वयं के गरम-आरामदायक घर और शांतिपूर्ण जीवन की कल्पना करने लगा. अचानक एक कार धुआँ छोडते हुए,अपनी बिजली की आँखों की चमक फैलाते हुए मेरी तरफ इस तरह बढ़ी कि मैं बाजू हट गया लेकिन मैं अपनी राइफल ताने रहा. 

आम नागरिकों के कपड़े पहना हुआ एक व्यक्ति उस कार से उतरा और उसने मुझ पर तिरछी निगाह डाली.उसने ध्यान दिया कि मैं कार से कैसे डर गया था. वह मुस्कुराया और फिर स्मोल्नी की ओर बढ्ने लगा.
मुझे गुस्सा आया और मैं उससे अधिका कड़ाई से पूछना चाहता था : “तुम्हारा परमिट?”
लेकिन मेरे होंठ जम गए थे और धमकाने वाले शब्दों के बजाय,मैं एक गुस्सैल बतख की तरह असपष्ट सा फुसफुसा सका.
फिर भी वह अजनबी समझ गया कि मैं उससे उसका परमिट मांग रहा हूँ.उसने अपनी जेबों में परमिट तलाश किया लेकिन वह उसे मिला नहीं. ठंडी हवा उसके कोट के किनारों और बाजू को चीर रही थी. चारों तरफ से हवा बह रही थी.वह ठंड से अकड़ सा गया था.
अन्ततः उसे अपना परमिट मिल गया. उसने अपना परमिट मेरी ओर बढ़ा दिया. लेकिन मैं आवश्यकता के अनुसार मुहर और हस्ताक्षर को ठीक से नहीं देख सका. मैं अपनी उँगलियों की जकड़ को ढीला नहीं कर सका क्यूंकी वे राइफल से चिपकी हुई थी.
उसका ध्यान उस ओर गया और उसने हमदर्दी के साथ कहा :
“तुम्हें यहाँ हाड़ गलाने वाली ठंड लग रही है,कॉमरेड.” 
उसने अपना परमिट मेरे और करीब बढ़ा दिया ताकि मैं मुहर को ठीक से देख सकूँ. उसने परमिट दिखाया और सीढ़ियों से ऊपर चला गया.
बस मामला निपट गया.वह चला गया और मैंने राहत की सांस ली.मैं एक व्यक्ति को इतनी घनघोर हवा में क्यूँ रोके हुए था? उसके कोट और जूते पतले थे ......
अचानक संतरियों का प्रभारी,वह बहादुर नाविक दौड़ता हुआ मेरे पास आया.वह बिना किनारे वाली टोपी और नाविकों वाली बिना बटन की बिरजिस पहने हुए था.उसके एक हाथ में राइफल और दूसरे हाथ में तलवार थी और दो ग्रेनेड उसकी बेल्ट से बंधे थे.
-नायमानावे आन्द्रेई,तुम तो पूरी तरह ठंड से अकड़ गए हो,मेरे भाई ?

      -    नहीं मैं ठीक हूँ,मैं इसे बर्दाश्त कर सकता हूँ.

-    तब फिर तुमने अधिकारियों से शिकायत क्यूँ की ?
-    मैंने किसी से शिकायत नहीं की ...
-    अरे हाँ,अब बताओ भी ! तब फिर व्लादिमिर इल्यीच ने तुम्हारे कारण अपने सहायकों को क्यूँ डांटा?उन्होंने कहा हमारे बिरादर की ठीक से देखभाल नहीं की गयी,चौकी पर तैनात संतरी ठंड से अकड़ गए हैं. उन्होंने तुरंत फर के कोट मंगाने का आदेश दिया.उनके लिए उबाली गई केतली उन्होंने हमारे पास भिजवा दी,ताकि हम बारी-बारी गरमागरम चाय पी कर शरीर को कुछ गरमा सकें..... तुमने जरूर उनसे भी कॉफी मांगी होगी ! मगर तुम हो बहुत चतुर !
-    क्या वे स्वयं लेनिन थे? मैंने दोबारा इसलिए पूछा क्यूंकि मैंने जो सुना मैं उस पर विश्वास नहीं कर पाया.
-    इस पर नाविक हंसने लगा : तुम भी अजीब हो !तुम लेनिन को नहीं पहचान सके !तुम शायद सोच रहे होगे कि लेनिन एक प्रकार के हर्क्युलिस या विशालकाय आदमी होंगे ....!
 उन्होंने जार को उखाड़ फेंका,दसियों लाख बुर्जुआओं को हरा दिया...वह एक शब्द भी कहते हैं तो पूरी दुनिया उसे सुनती है ! यह सब सही है-लेनिन के पास असाधारण शक्ति है. लेकिन एक व्यक्ति के रूप में वह बेहद सरल और सामान्य हैं.हमारे प्यारे कॉमरेड लेनिन. बल्कि उन्हें इल्यीच कहना बेहतर होगा. तो अब तुम जानते हो तुम किसकी रक्षा कर रहे हो. वह क्रांति के नेता हैं !चौकस रहो,सैनिक !
उसने तब समझाया और गार्ड रूम में चला गया.
ड्योढ़ी पर पहुँचते हुए,उसने पलट कर देखा और उल्लास में चिल्ला कर बोला : आधे घंटे बाद हम तुम्हारी जगह किसी और संतरी को भेज देंगे. चाय पीने आ जाना. नाविक चला गया और मैंने गरमी का अहसास किया. मेरा हृदय प्रेरणा से ओतप्रोत था. मैंने लेनिन को सर्द और जमा देने वाली हवाओं के बीच क्यूँ रोके रखा?
जल्द ही मेरी जगह किसी संतरी को भेज दिया गया और हँसते हुए सैनिक साथियों ने लेनिन की चाय की केतली से मुझे चाय दी. अचानक मुझे बुलवाया गया : आन्द्रेई नायमानावे, कॉमरेड उल्यानोव लेनिन तुमसे मिलना चाहते हैं !
          मेरे कदम लड़खड़ा उठे. 
मैं वहाँ पहुंचा. सभी संतरियों को मैं पहचानता था.उन्होंने ऐसे चेतावनी भरे अंदाज में देखा जैसे कि मैंने कोई गलती कर दी थी.
मुझे याद नहीं मैंने वहाँ कैसे प्रवेश किया और अपने आगमन की सूचना दी. मैंने एक सैनिक की तरह अपना हाथ अपनी हैट पर लगाया. मुझे व्लादिमिर इल्यीच का निश्चिंत चेहरा दिखाई दिया. वे बेहद स्नेह से मेरी ओर देख रहे थे. उन्होंने ये दस्ताने निकाले और मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा : कृपया ये दस्ताने ले लो. एक दयालु महिला ने मुझे ये उपहार स्वरूप दिये थे.उसने खुद ही उन्हें बुना था.
दस्ताने बेहद प्यारे,मोटे और गरम थे. राइफल से गोली चलाने में आसानी के लिए दायें हाथ के दस्ताने की दो उँगलियाँ अलग बंधी हुई थीं. वे दस्ताने हम सैनिकों के लिए एकदम उपयुक्त थे. फिर भी मुझे उन्हें लेते हुए शर्म महसूस हुई.
लेनिन मेरी झिझक भाँप गए.
-परेशान मत हो और इन्हें रख लो. तुम्हें इनकी जरूरत मुझसे ज्यादा है. वैसे भी मेरे पास अपने दस्ताने हैं.
उन्होंने इतने प्रेम से वे दस्ताने मेरे हाथों पर रखे कि वह मेरे दिल को छू गया.
मैंने सम्मान प्रकट किया और चला आया.......
  दादा आन्द्रेई ने बोलना बंद कर दिया,उन्होंने अपनी हथेली से आँखों को ढक लिया जैसे अपने उस प्रिय दृश्य को दोबारा देखना चाहते हों.   

उन्होंने गहरी सांस ली और कहा : यह बहुत पुरानी बात है. लेकिन मुझे अब भी अच्छी तरह से याद है..... हाँ,मुझे कॉमरेड लेनिन से इतना प्यारा,बेशकीमती तोहफ़ा मिला था.
-यह बेशकीमती है लेकिन आपने इन्हें ठीक से नहीं रखा- यह आन्द्रेई की पोती नताशा की तेज आवाज़ थी,जो हमेशा सबसे आगे रहती थी. ये हर जगतह से रफ़ू किए हुए हैं. आपने लेनिन के उपहार को फटने क्यूँ दिया,दादा जी ?
यह सुन कर पोती मारीशा ने ताली पीटते हुए कहा- तो आपको इन्हें छिपा देना चाहिए था, दादा जी !
दादा आन्द्रेई मुस्कुरा दिये इन्हें छिपाने की जरूरत नहीं है. ये हीरे नहीं हैं बल्कि साधारण दस्ताने हैं,लेनिन ने इन्हें मुझे महान काम के लिए,एक उद्देश्य के लिए भेंट किया था.
याशा अपनी बहनों से चिल्ला कर बोली – हाँ ताकि वह राइफल को ठीक से अपने हाथों में पकड़ सकें और दुश्मनों को हरा सकें,क्या तुम्हें समझ नहीं आता !
आन्द्रेई ने दस्तानों को वापस सन्दूक में रखते हुए कहा- हाँ,मैं यही कर रहा था,मैंने किसी भी दुश्मन को घुसने नहीं दिया और सभी प्रकार के लोगों की रक्षा की.  

  • या.पिन्यासोव 

यह किस्सा अनुराग ट्रस्ट,लखनऊ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका बच्चों के लेनिनसे साभार लिया गया है.

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