बैरागीवाला गांव देहरादून जिले के सहसपुर थाना क्षेत्र का एक गांव हैं.
13 जून 2026 को बैरागीवाला में एक हिंसक वारदात हुई, जिसमें विनोद कुमार कश्यप की नृशंस हत्या हो गया. इस जघन्य हत्या का आरोप बैरागीवाला के ही रहने वाले मासूम अली और उसके परिवार के लोगों पर लगा. विनोद कुमार भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता थे. जैसे ही उनकी हत्या की खबर आई, मामला इस वजह से भी ज्यादा तनावपूर्ण हो गया या बना दिया गया क्यूंकि हत्या का आरोप दूसरे धर्म के लोगों पर था.
इस घटने के अगले दिन तो बड़े पैमाने पर उपद्रव हुआ. आगजनी, पुलिस पर पथराव, कुछ घरों और मस्जिद पर भी पथराव हुआ. खूब नफरत भरे भाषण दिए गए, अश्लील-अभद्र नारे लगाए गए और आरोपी पक्ष के घर व दुकानों पर बुलडोजर भी चलाया गया.
बैरागीवाला गांव के हालात का जायजा लेने 18 जून को देहरादून से राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों का एक दल बैरागीवाला गांव गया.
हम सुबह लगभग दस बजे गांव पहुंचे. हाईवे से अंदर जब हम गांव की गलियों में पहुंचे तो लगभग सुनसान सा ही दिखाई दिया. हालांकि हमारे पहुंचने के कुछ देर बाद गलियों में गांव की गलियों में लोगों का आना-जाना, पेड़ के नीचे चबूतरों पर झुंड में बैठ कर बतियाना शुरू हो गया था. एक आम के बगीचे में खूब सारे पुलिस और आईटीबीपी के जवान जरुर दिखाई दिए. गांव से पहले हाईवे पर भी एक जगह दो-तीन पुलिस वाले बैठे थे. नामज़द आरोपियों में से छह गिरफ्तार किये जा चुके हैं.
बहरहाल जिनके हम गांव की गलियां कह रहे हैं, वे पर्याप्त चौड़ी सड़कें ही थी. यह इस गांव की ख़ास बात है कि सड़कें पक्की और ठीक-ठाक चौड़ी थी.
लोगों से पूछते हुए हम दिवंगत विनोद कुमार के घर पहुंचे. उनके घर के बगल के मंदिर में भी खूब सारी पुलिस थी, लगभग दर्जन भर तो महिला सब इंस्पेक्टर ही थी वहां पर.
घर के आंगन में ही दिवंगत विनोद के पिता और उनके दो भाई- अशोक और राजेश बैठे हुए थे. कुछ लोग शोक प्रकट करने आये हुए थे, जो हमारे पहुंचने पर उठ कर चले गए.
हम सब लोगों ने अपना परिचय देते हुए, विनोद कुमार की हत्या पर शोक जताते हुए बातचीत शुरू की.
दिवंगत विनोद कुमार के दोनों भाइयों- अशोक कुमार और राजेश कुमार ने बताया कि आरोपी पक्ष के साथ उनका विवाद पुराना था. वे आरोपी मासूम अली पर खनन माफिया होने का आरोप लगाते हैं और जमीने कब्जाने का भी आरोप लगाते हैं. वे यह भी कहते हैं कि 13 जून को घटी घटना अनायास नहीं हुई बल्कि आरोपी पक्ष की मंशा थी, ऐसी घटना करने की.
राजेश कुमार कहते हैं कि जमीन पर अतिक्रमण की उन्होंने शिकायत भी की थी और काफी बड़ा अतिक्रमण प्रशासन ने तोड़ा भी था. वे यह भी आरोप लगाते हैं कि जब इस्फाक की भतीजी ग्राम प्रधान बनी तो उस समय उन्होंने 67 लाख का घोटाला किया. राजेश का यह भी आरोप है कि उनकी शिकायत के बाद इस मामले में अधिकारियों ने मिलीभगत करके 2 लाख 18 हज़ार की रिकवरी का आदेश बनाया. उनका कहना है कि इस मामले में उन्होंने नैनीताल उच्च न्यायालय में जन हित याचिका भी लगाई हुई है. यह पूछने पर कि जन हित याचिका में क्या हुआ तो वे कहते हैं कि अब तक कुछ नहीं हुआ और हाल ही में उन्होंने अपना वकील बदला है.
गांव के दौरे पर आये हमारे दल के एक साथी ने राजेश से पूछा कि मासूम इतना कुछ बिना सत्ता में बैठी भाजपा के संरक्षण के तो नहीं कर पाता होगा तो राजेश ने जवाब दिया कि जमीन के खेल में तो नीचे से ऊपर तक पैसा जाता है और इसमें अधिकारी-नेता सभी शामिल हैं.
अशोक कुमार कहते हैं कि वे शटरिंग के उपकरणों का भी काम करते हैं और आरोपी मासूम का भतीजा उनसे लगभग 39 गार्डर ले ले गया था और उसने 13 गार्डर वापस किये थे. 16-17 हज़ार रुपये उन पर बकाया थे.
इस तरह देखें तो दिवंगत विनोद के परिवार और आरोपी परिवार में लंबे अरसे से एक किस्म की अदावत थी. झगड़ा भी था और कुछ कारोबारी लेनदेन भी था.
मृतक विनोद कुमार के बारे में उनके भाइयों ने बताया कि विनोद एमएससी किये हुए थे. वे बताते हैं कि विनोद ने सरस्वती विद्या मंदिर में अध्यापन भी किया, लेकिन वेतन कम होने के चलते तीन-चार साल पहले स्कूल छोड़ दिया. यह गौरतलब है कि संघ द्वारा संचालित स्कूल, एक भाजपा कार्यकर्ता को भी इसलिए छोड़ना पड़ा क्यूंकि वेतन बहुत कम था.
उनके भाइयों ने बताया कि विनोद आजकल निर्माण का काम देख रहे थे. वे लगभग घटना के समय पर ही गांव पहुंचे और मारपीट का शिकार हो गए. अशोक और राजेश का आरोप है कि मासूम ने ही औरों से कहा कि मारो.
गांव के एक चौराहे पर कुछ मुस्लिम लोगों से भी मुलाक़ात हुई. वे कहते हैं कि जो हुआ बुरा हुआ. वे यह भी कहते हैं कि ऐसा तो गांव में पहले कभी नहीं हुआ था. हालंकि मासूम के बाकी समयों में आचरण के बारे में उनकी कोई बहुत नकारात्मक राय नहीं है.
मुस्लिम समुदाय के लोग कहते हैं कि उस दिन उन्मादी भीड़ ने बेहद भद्दे और अभद्र नारे लगाए. यह पूछने पर कि क्या किसी ने उनको गांव छोड़ने के लिए कहा था तो वे कहते हैं कि उग्र माहौल में कहीं झगड़ा और न भड़क जाए, इसलिए वे खुद ही गांव छोड़ कर चले गए थे. जब प्रशासन ने उन्हें आश्वस्त किया कि अब शांति है तो उनमें से कुछ लौट आये हैं, कुछ लौट रहे हैं. कुछ ऐसे भी लोग थे, जिन्होंने कहा कि वे वहीं रहे, कहीं नहीं गए.
आरोपी परिवार के बुलडोजर से ढाए गए घर और आग लगाए सामान को भी हमने देखा. उग्र भीड़ की भावनाओं को तुष्ट करने के लिए की गयी बुलडोजर कार्यवाही कतई जायज नहीं ठहराई जा सकती. आरोपी ने यदि अपराध किया है तो उसे कानून के दायरे में सजा देना सुनिश्चित किया जाना चाहिए. यह कहना कि अवैध अतिक्रमण ढाया गया है, बड़ा खोखला तर्क है. क्या अवैध अतिक्रमण पर कार्यवाही करने के लिए इस बात का इंतजार किया जाता है कि कोई जघन्य वारदात हो तो कार्यवाही करें ?
उस घर के भग्नावशेषों में दो कुत्ते भी दिखाई दिए. उनमें से एक देसी नस्ल का है और काफी भारी-भरकम डील-डौल वाला जर्मन शेफर्ड ! आदमी तो सब फरार हैं पर कुत्ते वहीं हैं. उन कुत्तों देख कर याद आया कि तोड़फोड़,आगजनी के समय के वीडिओ में भी तीन भैंस भागती हुई दिखाई दी थी ! मनुष्य की नफरत और हिंसा की कीमत सिर्फ वो और उसका परिवार ही नहीं चुकाते हैं, बेजुबान पालतू पशु भी चुकाते देखे जा सकते हैं !
बैरागीवाला गांव में हिंदुओं और मुस्लिम में की आबादी लगभग बराबर है. कोई धार्मिक विद्वेष भी उस तरह से नज़र नहीं आता. हिंदू या मुस्लिम पक्ष के जो भी लोग मिले, उन्होंने किसी भी तरह के धार्मिक विद्वेष की बात से इंकार किया.
मृतक विनोद कुमार के भाइयों- अशोक कुमार और राजेश कुमार ने भी किसी तरह के धार्मिक विद्वेष से साफ़ तौर पर इंकार किया. उन्होंने कैमरे के सामने बयान दिया कि कई मुस्लिमों के साथ उनके घर जैसे संबंध हैं. ब्याह- शादी में और यहां तक कि हिंदू धर्म की कथा में भी मुस्लिम शामिल होते हैं. राजेश कहते हैं कि उनकी मां की शादी के वक्त मुस्लिमों ने भात भरा था. (भात भरना विवाह के दौरान होने वाली एक रस्म है)
वे कहते हैं कि गांव में तनाव के बावजूद विनोद की अंत्येष्टि में भी मुस्लिम लोग शामिल हुए.
गांव का दौरा करने वाले दल में भी मुस्लिम साथी थे, वे तो लगातार ही दिवंगत विनोद कुमार के पिता भगवत प्रसाद से बात करते रहे और भगवत प्रसाद ने ही लगभग आधे घंटे से अधिक वक्त तक पूरी घटना का विवरण उन्हें बताया.
इस पूरे ब्यौरे से यह साफ़ है कि वह दुखद घटना जिसमें विनोद कुमार की हत्या हुई आपराधिक है, नृशंस है. लेकिन वह कोई धार्मिक विवाद नहीं है, जैसा कि उसको न केवल सांप्रदायिक उन्मादी तत्वों ने बनाने की कोशिश की बल्कि घृणा भाषण के लिए दुनिया भर में ख्याति आर्जित कर चुके उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने भी पेश करने की कोशिश की ! हत्या के आरोपियों पर कठोर कार्यवही होनी चाहिए. लेकिन उन पर भी नकेल कसी जानी चाहिए, जो हर ऐसे अपराध को अपने लिए उत्पात करने का अवसर समझते हैं, जिसमें दूसरे धर्म का व्यक्ति शामिल हो !
बैरागीवाला के इस दौर में माकपा के राज्य सचिव कॉमरेड राजेन्द्र पुरोहित, उत्तराखंड इंसानियत मंच के हरिओम पाली और एक्टिविस्ट-पत्रकार त्रिलोचन भट्ट, उत्तराखंड महिला मंच की पद्मा गुप्ता, उत्तराखंड क्रांति दल के लताफत हुसैन, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के खुर्शीद अहमद, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के भूपाल, अधिवक्ता अलमासुद्दीन सिद्दीकी, कांग्रेस के याकूब सिद्दीकी, मजदूर संघर्ष मोर्चा के कुलदीप के साथ ही भाकपा(माले) की ओर से यह लेखक मौजूद था.
-इन्द्रेश मैखुरी
( वीडियो सौजन्य : त्रिलोचन भट्ट, अलमासुद्दीन सिद्दीकी)


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