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वे समय से पहले चुनाव करवा रहे हैं !







 कनाडा में वक्त से पहले चुनाव होने जा रहा है.  कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने गवर्नर जनरल मैरी साइमन से मिल कर संसद भंग करने की सिफ़ारिश कर दी है. कनाडा में अब 20 सितंबर को आम चुनाव होंगे.








लेकिन चुनाव होना तो सामान्य बात है, इसमें चर्चा का मसला क्या है ? जी हां, आम तौर पर तो चुनाव एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसकी सूचना तो दी जा सकती है, जीत-हार का विश्लेषण और अनुमान भी लगाया जा सकता है. पर उसमें कोई अन्य ऐसी खासियत नहीं होती कि उसकी विशेष चर्चा की जाये. पर कनाडा में समय से पहले चुनाव करवाने के पीछे वहां के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने जो तर्क दिया, वो खास है.


प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा कि वे समय से पहले चुनाव इसलिए करवा रहे हैं ताकि उनकी सरकार के कोरोना महामारी से निपटने के तौर तरीकों पर मतदाताओं की मोहर लग सके. कनाडा के लोगों को संबोधित करते हुए ट्रूडो ने कहा-“हमें आपका सहयोग मिला और अब समय आ गया है कि हम आपकी बात सुनें.”


समाचारों के अनुसार कनाडा में 71 प्रतिशत लोगों का पूरी तरह कोविड टीकाकरण हो चुका है और कम से कम 82 प्रतिशत को एक डोज़ लग चुकी है. कनाडा के पास अपनी सम्पूर्ण आबादी के लिए पर्याप्त टीके हैं.


कनाडा में सिर्फ कोविड से निपटने के सरकार के तौर-तरीकों पर जनता के राय जानने के लिए समय से पहले चुनाव कराना एक विशिष्ट घटना है. भारत के संदर्भ के साथ इसे देखें तो यह चौंकाने वाली घटना है. भारत में लोग इलाज के अभाव में मरे, ऑक्सीजन की कमी से मरे, मरने के बाद लाशों की बेकद्री हुई. पर इसपर जनमत सर्वेक्षण या जनादेश हासिल करने की बात तो छोड़िए, संसद में सरकार ने उल्टे यह कह दिया कि ऑक्सीजन की कमी से हुई मौत का सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं है, जो प्रकारांतर से ऑक्सीजन से हुई मौतों के तथ्यों को झुठलाने की ही कोशिश थी.


किसी भी लोकतंत्र में होना तो यही चाहिए कि समय-समय पर सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली के संबंध में जनता की राय को जानने के लिए कोई तौर-तरीका विकसित किया जाये. जस्टिन ट्रूडो, कोविड महामारी से निपटने के उनके सरकार के तरीके पर जनता की राय जानने के लिए चुनाव में जा रहे हैं. यह बड़ा कदम है पर महामारी भी तो भीषण थी.


क्या भारत में कोई ऐसा कदम उठाने या जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए इससे थोड़ा कम दर्जे का कदम उठाने का भी साहस करेगा ? छाती का माप, जुबानी जमा-खर्च से नहीं, ऐसे ही ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से पता चलेगा !


-इन्द्रेश मैखुरी 

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