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डॉ अम्बेडकर और लोकतंत्र

 


आज हम अपने लोकतंत्र को एक चुनौतीपूर्ण दौर में देख रहे हैं. हम देख रहे हैं कि लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं का निरंतर क्षरण हो रहा है, लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है. ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में यह देखना समीचीन होगा कि भारत में संवैधानिक लोकतंत्र की नींव रखने वाले डॉ. भीमराव अम्बेडकर लोकतंत्र को कैसे देख रहे थे, यह भी देखना दिलचस्प होगा कि आज की चुनौतियों का मुकाबला करने के सूत्र हमें उनके लेखन में कितना पाते हैं.









लोकतंत्र के बारे में वे विभिन्न लेखों व भाषणों में कहते हैं कि शासन करने वाले वर्ग (Governing Class) का अस्तित्व लोकतंत्र और स्वशासन के साथ असंगतिपूर्ण है. इसका आशय यह है कि यदि कोई शासन करने वाला वर्ग है और कोई शासित होने वाला वर्ग तो लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता. देश की आजादी की लड़ाई के संदर्भ में भी डॉ. अम्बेडकर सवाल उठाते हैं कि आजादी के संघर्ष का नेतृत्व करने वालों से यह पूछा जाना चाहिए कि वे शासन करने वाले वर्गों की आजादी के लिए लड़ रहे हैं या फिर भारत के लोगों की आजादी के लिए ? डॉ. अम्बेडकर भी यह लिखते हैं और उनकी ऊपर कही बातों से भी स्पष्ट है कि लोकतंत्र में यदि शासन करने वाले वर्ग और शासित होने वाले वर्ग रहेंगे तो फिर लोकतंत्र की जो मूलभूत परिभाषा है- जनता की सरकार, जनता के लिए, जनता के द्वारा- वो कभी मूर्त रूप नहीं ले सकेगी.


अम्बेडकर कहते हैं कि राजनीतिक लोकतंत्र, बिना सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के सफल नहीं हो सकता. वे लिखते हैं कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र, राजनीतिक लोकतंत्र के तत्व और तंतु हैं, जो उसकी मजबूती के लिए आवश्यक हैं.


वर्तमान दौर में हम देख रहे हैं कि अल्पसंख्यक द्वेषी माहौल लगातार ही सत्ता शीर्ष से देश के कोने-कोने में पहुँच रहा है. लोकतंत्र पर एक बहुसंख्यकवाद निरंतर हावी होने की कोशिश कर रहा है. देश के सत्ता शीर्ष पर जो सांप्रदायिक फासीवादी विचार के अनुगामी पहुंच चुके हैं, अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा का प्रसार, उनकी राजनीति का स्थायी तत्व है. 04 नवम्बर 1948 को संविधान सभा के समक्ष संविधान के मसौदे को प्रस्तुत करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि “यह बहुमत को महसूस करना होगा कि यह उसका कर्तव्य है कि अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव न करे. अल्पसंख्यक बने रहेंगे या गायब हो जाएंगे, यह निश्चित ही बहुमत की आदत पर निर्भर होना चाहिए. जिस क्षण बहुमत, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव की आदत छोड़ देगा, उस वक्त अल्पसंख्यकों के होने का कोई आधार नहीं बचेगा.” लेकिन इस मुल्क में तो निरंतर भेदभाव करके, कत्लेआम करके अल्पसंखयकों के खात्मे का रास्ता तय करने की कोशिश की जा रही है. अम्बेडकर जब अल्पसंख्यकों के गायब होने के लिए बहुसंख्यकों के द्वारा भेदभाव के खात्मे का रास्ता तजवीज करते हैं तो उनका आशय है कि मुल्क में न कोई अल्पसंख्यक हो ना बहुसंख्यक बल्कि सब मनुष्य हों. लेकिन इस मुल्क में साम्प्रदायिक फासीवादी निजाम के कार्यकाल में उल्टा रास्ता पकड़ लिया गया है, जो निश्चित ही तबाही की तरफ जाता है.


1928 में साइमन कमीशन के सामने सार्वत्रिक मताधिकार यानि सबको वोट देने के अधिकार की पुरजोर वकालत करते हुए डॉ अम्बेडकर ने कहा था- “अगर मताधिकार, एक विशेषाधिकार समझा जाएगा, जिसे राजनीतिक सत्ता में बैठे हुए लोग इस आधार पर  देंगे या रोक लेंगे कि इसका क्या उपयोग होगा तो फिर मताधिकार हीन लोगों की राजनीतिक मुक्ति पूरी तरह से उनके रहमो करम पर होगी, जो मताधिकार युक्त हैं.  ऐसे निष्कर्ष को स्वीकार करना ऐसा ही होगा, जैसे यह स्वीकार करना कि दासता कोई गलत बात नहीं है.” वे आगे कहते हैं कि मताधिकार सिर्फ मतपत्र पर निशान लगाने का अधिकार भर नहीं है बल्कि यह समाज के नियमन में और बेहतर कार्यों में प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी का अधिकार है. वे निष्कर्ष के तौर पर कहते हैं कि “... व्यक्ति जितना गरीब है, उसे मताधिकार संपन्न करने की उतनी ही अधिक जरूरत है.” अम्बेडकर तो गुलाम भारत में अंग्रेजों को सार्वत्रिक मताधिकार का महत्व समझा रहे थे, सभी भारतीयों के लिए सार्वत्रिक मताधिकार की मांग कर रहे थे. लेकिन आज़ाद देश में आज आजादी के 78 सालों बाद और संविधान लागू होने के 75 साल बाद विशेष गहन पुनर्रीक्षण यानि एसआईआर के नाम पर लाखों भारतीयों को मताधिकार विहीन किया जा रहा है ! आबादी के अच्छे खासे हिस्से को यदि मताधिकार विहीन किया जा रहा है तो निश्चित ही यह लोकतंत्र की कब्र खोदने जैसा है.


04 नवंबर 1948 को ही संविधान सभा के समक्ष बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर ने केंद्र को अधिक मजबूत किये जाने के संदर्भ में कहा था “ हमें इसे और अधिक मजबूत बनाने की प्रवृत्ति का प्रतिरोध करना चाहिए. वह जितना पचा सकता है, उससे अधिक नहीं चबा सकता है. उसकी शक्ति को उसके वजन के अनुरूप होना चाहिए. यह नासमझी होगी कि उसे इतना मजबूत बना दिया जाए कि वह अपने ही वजन से गिर पड़े.” सब कुछ केंद्रीय सत्ता के हाथों में केन्द्रित करने की प्रवृत्ति के इस दौर में अम्बेडकर के उक्त शब्दों को याद करते हुए इस प्रवृति का मजबूती से प्रतिरोध कर देश के संघीय ढांचे को कायम रखना होगा.


इसी भाषण में अम्बेडकर चेतावनी देते हैं कि बिना संविधान बदले,  सिर्फ प्रशासन का रूप बदल कर संविधान का निषेध किया जा सकता है  और इसे संविधान की भावना से असंगतिपूर्ण और विपरीत बनाया जा सकता है. इस दौर में तो यह चेतावनी, हमारे सामने साक्षात आकार लेती हुई दिख रही है. संविधान और लोकतंत्र को बचाने की जरूरत इसीलिए है.


04 नवंबर 1948 के भाषण में ही डॉ अम्बेडकर ने कहा था कि “भारत में  लोकतंत्र, उस भारतीय जमीन पर सिर्फ ऊपरी मुल्लमा है, जो अनिवार्यतः अलोकतांत्रिक है.” सत्तर-अस्सी सालों की यात्रा में हम जहां पहुंचे हैं, वहां “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” की प्रतिगामी शक्तियां, लोकतंत्र के इस ऊपरी मुलम्मे को भी नोंच डालना चाहती हैं. यह लोकतंत्र पसंद ताकतों के सामने चुनौती है कि वे लोकतंत्र को मुलम्मे से आगे ले जाकर सच्चे अर्थों के लोकतंत्र,अम्बेडकर के शब्दों में- सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक लोकतंत्र- में तब्दील करने के संघर्ष में प्राणपण से जुटें. यही अम्बेडकर को याद करने को सार्थक बना सकता है.


-इन्द्रेश मैखुरी

 

 

संदर्भ : The Essential Writings of B.R. Ambedkar : Valerian Rodrigues

 

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